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Rigveda Mandal 2 / Sukta 28 / Mantra 7

43 Sukta
11 Mantra
2/28/7
Devata- वरुणः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा नो॑ व॒धैर्व॑रुण॒ ये त॑ इ॒ष्टावेनः॑ कृ॒ण्वन्त॑मसुर भ्री॒णन्ति॑। मा ज्योति॑षः प्रवस॒थानि॑ गन्म॒ वि षू मृधः॑ शिश्रथो जी॒वसे॑ नः॥

मा । नः॒ । व॒धैः । व॒रु॒ण॒ । ये । ते॒ । इ॒ष्टौ । एनः॑ । कृ॒ण्वन्त॑म् । अ॒सु॒र॒ । भ्री॒णन्ति॑ । मा । ज्योति॑षः । प्र॒ऽव॒स॒थानि॑ । ग॒न्म॒ । वि । सु । मृधः॑ । शि॒श्र॒थः॒ । जी॒वसे॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
मा नो वधैर्वरुण ये त इष्टावेनः कृण्वन्तमसुर भ्रीणन्ति। मा ज्योतिषः प्रवसथानि गन्म वि षू मृधः शिश्रथो जीवसे नः॥

मा। नः। वधैः। वरुण। ये। ते। इष्टौ। एनः। कृण्वन्तम्। असुर। भ्रीणन्ति। मा। ज्योतिषः। प्रऽवसथानि। गन्म। वि। सु। मृधः। शिश्रथः। जीवसे। नः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 2

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Meaning
हे (असुर) दुर्गुणों को दूर करनेहारे (वरुण) वायु के तुल्य वर्त्तमान पुरुष (ये) जो लोग (ते) आपके (इष्टौ) संगति करने रूप व्यवहार में (एनः) पाप (कृण्वन्तम्) करते हुए को (भ्रीणन्ति) धमकाते हैं वे (नः) हमारे (वधैः) मारने से (मा) न वर्त्तें (ज्योतिषः) प्रकाश से (प्रवसथानि) प्रवासों दूर देशों को (मा,गन्म) न प्राप्त हों आप (नः) हमारे (जीवसे) जीवन के लिये (मृधः) संग्रामों को (वि,शिश्रथः) विशेषकर मारिये जिससे हमलोग निरन्तर सुख को (सु) अच्छे प्रकार प्राप्त होवें ॥७॥
Essence
जो मनुष्य धर्मात्माओं को नहीं मारते, दुष्टों को ताड़ना देते, किसी के प्रवास को न रोकते और सबके सुख के लिये शत्रुओं को जीतते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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