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Rigveda Mandal 2 / Sukta 28 / Mantra 6

43 Sukta
11 Mantra
2/28/6
Devata- वरुणः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपो॒ सु म्य॑क्ष वरुण भि॒यसं॒ मत्सम्रा॒ळृता॒वोऽनु॑ मा गृभाय। दामे॑व व॒त्साद्वि मु॑मु॒ग्ध्यंहो॑ न॒हि त्वदा॒रे नि॒मिष॑श्च॒नेशे॑॥

अपो॒ इति॑ । सु । म्य॒क्ष॒ । व॒रु॒ण॒ । भि॒यस॑म् । मत् । सम्ऽरा॑ट् । ऋत॒ऽवः । अनु॑ । मा॒ । गृ॒भा॒य॒ । दाम॑ऽइव । व॒त्सात् । वि । मु॒मु॒ग्धि॒ । अंहः॑ । न॒हि । त्वत् । आ॒र्ते । नि॒ऽमिषः॑ । च॒न । ईशे॑ ॥

Mantra without Swara
अपो सु म्यक्ष वरुण भियसं मत्सम्राळृतावोऽनु मा गृभाय। दामेव वत्साद्वि मुमुग्ध्यंहो नहि त्वदारे निमिषश्चनेशे॥

अपो इति। सु। म्यक्ष। वरुण। भियसम्। मत्। सम्ऽराट्। ऋतऽवः। अनु। मा। गृभाय। दामऽइव। वत्सात्। वि। मुमुग्धि। अंहः। नहि। त्वत्। आरे। निऽमिषः। चन। ईशे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वरुण) श्रेष्ठ जन आप (मत्) मेरे सम्बन्ध से (भियसम्) भय को (अपो,न्यक्ष) दूर कीजिये, हे (तावः) बहुत सत्य को ग्रहण करनेवाले (सम्राट्) सम्यक् प्रकाशमान आप (मा) मुझ पर (अनु,गृभाय) अनुग्रह करो (वत्सात्) बछड़े से गौ को वैसे मुझसे (अंहः) अपराध को (सु,वि,मुमुग्धि) सुन्दर प्रकार विशेषकर छुड़ाइये (त्वत्) आपके सम्बन्ध से (आरे) निकट वा दूर (निमिषः) निरन्तर (चन) भी कोई (नहि) नहीं (ईशे) समर्थ होता है ॥६॥
Essence
अध्यापक और उपदेशक पहले से सबके भय को निकाल विद्या का ग्रहण करावें, बुरे व्यसन छुड़ावें, जिससे उनके दूर वा समीप में कोई धर्म से रोकनेवाला न हो ॥६॥
Subject
फिर अध्यापक और उपदेशक के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।