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Rigveda Mandal 2 / Sukta 28 / Mantra 5

43 Sukta
11 Mantra
2/28/5
Devata- वरुणः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि मच्छ्र॑थाय रश॒नामि॒वाग॑ ऋ॒ध्याम॑ ते वरुण॒ खामृ॒तस्य॑। मा तन्तु॑श्छेदि॒ वय॑तो॒ धियं॑ मे॒ मा मात्रा॑ शार्य॒पसः॑ पु॒र ऋ॒तोः॥

वि । मत् । श्र॒थ॒य॒ । र॒श॒नाम्ऽइ॑व । आगः॑ । ऋ॒ध्याम॑ । ते॒ । व॒रु॒ण॒ । खाम् । ऋ॒तस्य॑ । मा । तन्तुः॑ । छे॒दि॒ । वय॑तः । धिय॑म् । मे॒ । मा । मात्रा॑ । शा॒रि॒ । अ॒पसः॑ । पु॒रा । ऋ॒तोः ॥

Mantra without Swara
वि मच्छ्रथाय रशनामिवाग ऋध्याम ते वरुण खामृतस्य। मा तन्तुश्छेदि वयतो धियं मे मा मात्रा शार्यपसः पुर ऋतोः॥

वि। मत्। श्रथय। रशनाम्ऽइव। आगः। ऋध्याम। ते। वरुण। खाम्। ऋतस्य। मा। तन्तुः। छेदि। वयतः। धियम्। मे। मा। मात्रा। शारि। अपसः। पुरा। ऋतोः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 5

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Meaning
हे (वरुण) श्रेष्ठ पुरुष आप (रशनामिव) रस्सी के तुल्य (मत्,आगः) मुझसे अपराध को (वि,श्रथय) विशेष कर नष्ट कीजिये जिससे (ते) आपके समीप हमलोग (ध्याम) उन्नत हों जैसे (तस्य) जल की (खाम्) नदी को नहीं नष्ट करते वैसे आपसे (तन्तुः) मूल (मा)(छेदि) नष्ट किया जाये (वयतः) प्राप्त होते हुए (मे) मेरी (धियम्) बुद्धि को नष्ट न कीजिये (तोः) तु समय से (पुरा) पहले (अपसः) कर्म से मत (शारि) नष्ट कीजिये और (मात्रा) माता के साथ विरोध (मा) मत कर ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रस्सी से बंधे हुए घोड़े नियम से चलते हैं, वैसे ही माता-पिता और आचार्य के नियम में बंधे हुए बालक विद्यार्थी विद्या और सुशिक्षा को ग्रहण करें, कभी मादक द्रव्य के सेवन से बुद्धि को नष्ट न करें, विवाह करके सदैव तुगामी हों और सन्तानों के प्रवाह को न तोड़ें ॥५॥
Subject
फिर विद्यार्थी लोग कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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