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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 8

43 Sukta
17 Mantra
2/27/8
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति॒स्रो भूमी॑र्धारय॒न् त्रीँरु॒त द्यून्त्रीणि॑ व्र॒ता वि॒दथे॑ अ॒न्तरे॑षाम्। ऋ॒तेना॑दित्या॒ महि॑ वो महि॒त्वं तद॑र्यमन्वरुण मित्र॒ चारु॑॥

ति॒स्रः । भूमीः॑ । धा॒र॒य॒न् । त्रीन् । उ॒त । द्यून् । त्रीणि॑ । व्र॒ता । वि॒दथे॑ । अ॒न्तः । ए॒षा॒म् । ऋ॒तेन॑ । आ॒दि॒त्याः॒ । महि॑ । वः॒ । म॒हि॒ऽत्वम् । तत् । अ॒र्य॒म॒न् । व॒रु॒ण॒ । मि॒त्र॒ । चारु॑ ॥

Mantra without Swara
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीँरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम्। ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन्वरुण मित्र चारु॥

तिस्रः। भूमीः। धारयन्। त्रीन्। उत। द्यून्। त्रीणि। व्रता। विदथे। अन्तः। एषाम्। ऋतेन। आदित्याः। महि। वः। महिऽत्वम्। तत्। अर्यमन्। वरुण। मित्र। चारु॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अर्य्यमन्) न्याय करनेहारे (वरुण) शान्तशील (मित्र) मित्रजन जैसे (तेन) सत्यस्वरूप परमेश्वर ने धारण किये (आदित्याः) सूर्यलोक (तिस्रः) तीन प्रकार की (भूमीः) भूमियों को (उत) और (त्रीन्) तीन प्रकार के (द्यून्) प्रकाशों को (धारयन्) धारण करते हैं वैसे आप (विदथे) जानने योग्य व्यवहार में (व्रता) शरीर आत्मा और मन से उत्पन्न हुए धर्मयुक्त (त्री) तीन प्रकार के कर्मों को धारण करो कराओ जो (एषाम्) इन सूर्य लोकों के (अन्तः) मध्य में (महित्वम्) महत्त्व (चारु) सुन्दर स्वरूप वा (महि) बड़ा कर्म है (तत्) वह (वः) आप लोगों का होवे ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जैसे भूमि और सूर्य्यादि लोक ईश्वर के नियम से बंधे हुए यथावत् अपनी-अपनी क्रिया करते हैं, वैसे मनुष्यों को भी जानना और वर्त्ताव करना चाहिये। इस जगत् में उत्तम मध्यम और अधम तीन प्रकार की भूमि और अग्नि है तथा सूर्य्यलोक भूमिलोक से बड़े-बड़े हैं ॥८॥
Subject
फिर मनुष्य किसके तुल्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।