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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 5

43 Sukta
17 Mantra
2/27/5
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒द्यामा॑दित्या॒ अव॑सो वो अ॒स्य यद॑र्यमन्भ॒य आ चि॑न्मयो॒भु। यु॒ष्माकं॑ मित्रावरुणा॒ प्रणी॑तौ॒ परि॒ श्वभ्रे॑व दुरि॒तानि॑ वृज्याम्॥

वि॒द्याम् । आ॒दि॒त्याः॒ । अव॑सः । वः॒ । अ॒स्य । य॒त् । अ॒र्य॒म॒न् । भ॒ये । आ । चि॒त् । म॒यः॒ऽभु । यु॒ष्माक॑म् । मि॒त्रा॒व॒रुणा॒ । प्रऽनी॑तौ । परि॑ । श्वभ्रा॑ऽइव । दुः॒ऽइ॒तानि॑ । वृ॒ज्या॒म् ॥

Mantra without Swara
विद्यामादित्या अवसो वो अस्य यदर्यमन्भय आ चिन्मयोभु। युष्माकं मित्रावरुणा प्रणीतौ परि श्वभ्रेव दुरितानि वृज्याम्॥

विद्याम्। आदित्याः। अवसः। वः। अस्य। यत्। अर्यमन्। भये। आ। चित्। मयःऽभु। युष्माकम्। मित्रावरुणा। प्रऽनीतौ। परि। श्वभ्राऽइव। दुःऽइतानि। वृज्याम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (आदित्याः) सूर्य के तुल्य विद्या के प्रकाशक लोगों तथा हे (अर्यमन्) श्रेष्ठ मनुष्यों का सत्कार करनेहारे सज्जन (यत्) जो (भये) भय होने में (वः) आपको (अस्य) इस (अवसः) पालन के निमित्त (चित्) थोड़ा भी (मयोभु) सुखदायी वचन हो उसको मैं (आ,विद्याम्) प्राप्त होऊँ वा जानूँ तथा हे (मित्रावरुणा) प्राणापान के तुल्य सुखदायी विद्वानों (युष्माकम्) तुम्हारी (प्रणीतौ) उत्तम नीति में (श्वभ्रेव) पृथिवी के गढ़े के तुल्य (दुरितानि) दुःख देनेवाले पापों को (परि,वृज्याम्) परित्याग करूँ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् लोग सब प्राणियों के भय का विनाश कर सुख पहुँचा के पापों को निवृत्त करते हैं, वैसा निरन्तर करें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।