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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 4

43 Sukta
17 Mantra
2/27/4
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धा॒रय॑न्त आदि॒त्यासो॒ जग॒त्स्था दे॒वा विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य गो॒पाः। दी॒र्घाधि॑यो॒ रक्ष॑माणा असु॒र्य॑मृ॒तावा॑न॒श्चय॑माना ऋ॒णानि॑॥

धा॒रय॑न्तः । आ॒दि॒त्यासः॑ । जग॑त् । स्थाः । दे॒वाः । विश्व॑स्य । भुव॑नस्य । गो॒पाः । दी॒र्घऽधि॑यः । रक्ष॑माणाः । अ॒सु॒र्य॑म् । ऋ॒तऽवा॑नः । चय॑मानाः । ऋ॒णानि॑ ॥

Mantra without Swara
धारयन्त आदित्यासो जगत्स्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः। दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि॥

धारयन्तः। आदित्यासः। जगत्। स्थाः। देवाः। विश्वस्य। भुवनस्य। गोपाः। दीर्घऽधियः। रक्षमाणाः। असुर्यम्। ऋतऽवानः। चयमानाः। ऋणानि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो जो (जगत्) चर और (स्थाः) अचर को (धारयन्तः) धारण करते हुए (विश्वस्य) सब (भुवनस्य) निवास के आधार स्थावर और प्राणिमात्र जंगम जगत् के (गोपाः) रक्षक (दीर्घाधियः) बड़ी बुद्धिवाले (असुर्यम्) मूर्खों के धन की (रक्षमाणाः) रक्षा करते हुए (तावानः) सत्य के सेवी (णानि) दूसरों को देने योग्य विद्वानों को (चयमानाः) बढ़ाते हुए (आदित्यासः) पूर्ण विद्यावाले (देवाः) सूर्यादि के तुल्य तेजस्वी विद्वान् लोग बुद्धि से भीतर देखते हैं, वे अध्यापक होने योग्य हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में (अन्तः,पश्यन्ति) इन दो पदों की अनुवृत्ति पूर्व मन्त्र से आती है। यदि विद्वान् पढ़नेवाले विद्यार्थियों को विद्या न देवें तो वे णी हो जावें, यही ण चुकाना है जो स्वयं पढ़ कर दूसरों को पढ़ाना चाहिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।