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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 3

43 Sukta
17 Mantra
2/27/3
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त आ॑दि॒त्यास॑ उ॒रवो॑ गभी॒रा अद॑ब्धासो॒ दिप्स॑न्तो भूर्य॒क्षाः। अ॒न्तः प॑श्यन्ति वृजि॒नोत सा॒धु सर्वं॒ राज॑भ्यः पर॒मा चि॒दन्ति॑॥

ते । आ॒दि॒त्यासः॑ । उ॒रवः॑ । ग॒भी॒राः । अद॑ब्धासः । दिप्स॑न्तः । भू॒रि॒ऽअ॒क्षाः । अ॒न्तरिति॑ । प॒श्य॒न्ति॒ । वृ॒जि॒ना । उ॒त । सा॒धु । सर्व॑म् । राज॑ऽभ्यः । प॒र॒मा । चि॒त् । अन्ति॑ ॥

Mantra without Swara
त आदित्यास उरवो गभीरा अदब्धासो दिप्सन्तो भूर्यक्षाः। अन्तः पश्यन्ति वृजिनोत साधु सर्वं राजभ्यः परमा चिदन्ति॥

ते। आदित्यासः। उरवः। गभीराः। अदब्धासः। दिप्सन्तः। भूरिऽअक्षाः। अन्तरिति। पश्यन्ति। वृजिना। उत। साधु। सर्वम्। राजऽभ्यः। परमा। चित्। अन्ति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (गभीराः) गम्भीर स्वभावयुक्त (उरवः) तीव्रबुद्धिवाले (अदब्धासः) अहिंसनीय (भूर्यक्षाः) बहुत प्रकार से देखने जाननेवाले (आदित्यासः) अड़तालीस वर्ष के ब्रह्मचर्य को सेवके पूर्ण विद्यावाले विद्वान् हैं (ते) वे (परमा) उत्तम कर्मों का आचरण करते जो (वृजिना) पाप करते हुए (दिप्सन्तः) दम्भ की इच्छा करनेवाले हों उनको (चित्) ही (अन्तः) अन्तःकरण में (अन्ति) निकट से (पश्यन्ति) देख लेते हैं अर्थात् उनसे मिलते नहीं और जो (राजभ्यः) राजपुरुषों के लिये (सर्वम्) सब (साधु) श्रेष्ठ काम करते हैं, वे परीक्षा कर सकते हैं ॥३॥
Essence
परीक्षा करनेवाले जन श्रेष्ठ और दुष्ट पुरुषों की उत्तम प्रकार परीक्षा करते उत्तम स्वभाववालों के सत्कार और कुत्सित चरित्रवालों के अनादर को करके विद्या की उन्नति निरन्तर करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।