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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 16

43 Sukta
17 Mantra
2/27/16
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या वो॑ मा॒या अ॑भि॒द्रुहे॑ यजत्राः॒ पाशा॑ आदित्या रि॒पवे॒ विचृ॑त्ताः। अ॒श्वीव॒ ताँ अति॑ येषं॒ रथे॒नारि॑ष्टा उ॒रावा शर्म॑न्त्स्याम॥

याः । वः॒ । मा॒याः । अ॒भि॒ऽद्रुहे॑ । यजत्राः॑ । पाशाः॑ । आ॒दि॒त्याः॒ । रि॒पवे॑ । विऽचृ॑त्ताः । अ॒श्वीऽइ॑व । तान् । अति॑ । ये॒ष॒म् । रथे॑न । अरि॑ष्टाः । उ॒रौ । आ । शर्म॑न् । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
या वो माया अभिद्रुहे यजत्राः पाशा आदित्या रिपवे विचृत्ताः। अश्वीव ताँ अति येषं रथेनारिष्टा उरावा शर्मन्त्स्याम॥

याः। वः। मायाः। अभिऽद्रुहे। यजत्राः। पाशाः। आदित्याः। रिपवे। विऽचृत्ताः। अश्वीऽइव। तान्। अति। येषम्। रथेन। अरिष्टाः। उरौ। आ। शर्मन्। स्याम॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 8 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यजत्राः) सत्संग करने के स्वभाववाले (आदित्याः) सूर्य के तुल्य विद्या से प्रकाशमान विद्वानो (याः) जो (वः) आप लोगों की (विचृत्ताः) विस्तृत (अरिष्टाः) किसी से खण्डित न होने योग्य (मायाः) बुद्धियाँ (अभिद्रुहे) सब ओर से द्रोह करनेवाले (रिपवे) शत्रु के लिये (पाशाः) फाँसी के तुल्य बाँधने वाली होती हैं (तान्) उन तुम लोगों के (अति) निकट प्राप्त होने को मैं (अश्वीव) घोड़ी के तुल्य (आ,येषम्) प्रयत्न करूँ और हम लोग (रथेन) रमण के साधन रथ से (उरौ) बड़े (शर्मन्) घर में सुखी (स्याम) होवें ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पण्डित लोग द्रोह को छोड़ के जिनके कोई शत्रु नहीं ऐसे हों, वे दुष्टों को पाशों से बाँधे और उनकी रक्षा करके सब सुखी हों ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।