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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 11

43 Sukta
17 Mantra
2/27/11
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न द॑क्षि॒णा वि चि॑किते॒ न स॒व्या न प्रा॒चीन॑मादित्या॒ नोत प॒श्चा। पा॒क्या॑ चिद्वसवो धी॒र्या॑ चिद्यु॒ष्मानी॑तो॒ अभ॑यं॒ ज्योति॑रश्याम्॥

न । द॒क्षि॒णा । वि । चि॒कि॒ते॒ । न । स॒व्या । न । प्रा॒चीन॑म् । आ॒दि॒त्याः॒ । न । उ॒त । प॒श्चा । पा॒क्या॑ । चि॒त् । व॒स॒वः॒ । धी॒र्या॑ । चि॒त् । यु॒ष्माऽनी॑तः । अभ॑यम् । ज्योतिः॑ । अ॒श्या॒म् ॥

Mantra without Swara
न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा। पाक्या चिद्वसवो धीर्या चिद्युष्मानीतो अभयं ज्योतिरश्याम्॥

न। दक्षिणा। वि। चिकिते। न। सव्या। न। प्राचीनम्। आदित्याः। न। उत। पश्चा। पाक्या। चित्। वसवः। धीर्या। चित्। युष्माऽनीतः। अभयम्। ज्योतिः। अश्याम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 8 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (आदित्याः) सूर्यलोक (न) नहीं (दक्षिणा) दक्षिण (न)(सव्या) उत्तर (न)(प्राचीनम्) पूर्व (उत) और (न)(पश्चा) पश्चिम दिशा में भ्रमते हैं (चित्) और जिनके आधार में (वसवः) पृथिवी आदि वसु (चित्) भी वसते हैं जिनको (पाक्या) बुद्धिमान् (धीर्या) धीर विद्वानों में श्रेष्ठजन (विचिकिते) विशेष कर जानता है उनका आश्रय कर (युष्मानीतः) तुम लोगों से प्राप्त हुआ मैं (अभयम्) भयरहित (ज्योतिः) प्रकाशरूप ज्ञान को (अश्याम्) प्राप्त होऊँ ॥११॥
Essence
हे मनुष्यो जो सूर्य सब दिशाओं में नहीं भ्रमते, जिनके आधार से पृथिवी आदि लोक भ्रमते हैं, उनके विज्ञानपूर्वक परमात्मा को जान के अभयरूप पदको प्राप्त होओ ॥११॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।