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Rigveda Mandal 2 / Sukta 27 / Mantra 10

43 Sukta
17 Mantra
2/27/10
Devata- आदित्याः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं विश्वे॑षां वरुणासि॒ राजा॒ ये च॑ दे॒वा अ॑सुर॒ ये च॒ मर्ताः॑। श॒तं नो॑ रास्व श॒रदो॑ वि॒चक्षे॒ऽश्यामायूं॑षि॒ सुधि॑तानि॒ पूर्वा॑॥

त्वम् । विश्वे॑षाम् । व॒रु॒ण॒ । अ॒सि॒ । राजा॑ । ये । च॒ । दे॒वाः । अ॒सु॒र॒ । ये । च॒ । मर्ताः॑ । श॒तम् । नः॒ । रा॒स्व॒ । श॒रदः॑ । वि॒ऽचक्षे॑ । अ॒श्याम॑ । आयूं॑षि । सुधि॑तानि । पूर्वा॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असुर ये च मर्ताः। शतं नो रास्व शरदो विचक्षेऽश्यामायूंषि सुधितानि पूर्वा॥

त्वम्। विश्वेषाम्। वरुण। असि। राजा। ये। च। देवाः। असुर। ये। च। मर्ताः। शतम्। नः। रास्व। शरदः। विऽचक्षे। अश्याम। आयूंषि। सुधितानि। पूर्वा॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 7 Mantra » 5

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Meaning
हे (वरुण) अतिश्रेष्ठ (असुर) मद्यपान से सर्वथा रहित विद्वान् पुरुष जो (त्वम्) आप (विश्वेषाम्) सब मनुष्यादि जगत् के (राजा) राजा (असि) हो (च) और (ये) जो (देवाः) विद्वान् सभासद् (च) और (ये) जो (मर्त्ताः) साधारण मनुष्य हैं उनको हमारे (विचक्षे) विविध प्रकार के देखने को (शतम्) सौ (शरदः) वर्ष (नः) हमको (रास्व) दीजिये जिससे हम लोग (पूर्वा) पहिली (सुधितानि) सुन्दर प्रकार धारण की हुई अवस्थाओं को (अश्याम) भोगें प्राप्त हों ॥१०॥
Essence
जो मनुष्य पूर्ण ब्रह्मचर्य्य का सेवन करके अति विषयासक्ति को छोड़ देते हैं, वे सौ वर्ष से न्यून आयु को नहीं भोगते। इस ब्रह्मचर्य्यसेवन के विना मनुष्य कदापि दीर्घ अवस्थावाले नहीं हो सकते ॥१०॥
Subject
अब मनुष्य कैसे दीर्घ आयुवाले हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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