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Rigveda Mandal 2 / Sukta 26 / Mantra 4

43 Sukta
4 Mantra
2/26/4
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यो अ॑स्मै ह॒व्यैर्घृ॒तव॑द्भि॒रवि॑ध॒त्प्र तं प्रा॒चा न॑यति॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। उ॒रु॒ष्यती॒मंह॑सो॒ रक्ष॑ती रि॒षों॒३॒॑होश्चि॑दस्मा उरु॒चक्रि॒रद्भु॑तः॥

यः । अ॒स्मै॒ । ह॒व्यैः । घृ॒तव॑त्ऽभिः । अवि॑धत् । प्र । तम् । प्रा॒चा । न॒य॒ति॒ । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ । उ॒रु॒ष्यती॑म् । अंह॑सः । रक्ष॑ति । रि॒षः । अं॒होः । चित् । अ॒स्मै॒ । उ॒रु॒ऽचक्रिः॑ । अद्भु॑तः ॥

Mantra without Swara
यो अस्मै हव्यैर्घृतवद्भिरविधत्प्र तं प्राचा नयति ब्रह्मणस्पतिः। उरुष्यतीमंहसो रक्षती रिषों३होश्चिदस्मा उरुचक्रिरद्भुतः॥

यः। अस्मै। हव्यैः। घृतवत्ऽभिः। अविधत्। प्र। तम्। प्राचा। नयति। ब्रह्मणः। पतिः। उरुष्यतीम्। अंहसः। रक्षति। रिषः। अंहोः। चित्। अस्मै। उरुऽचक्रिः। अद्भुतः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (उरुचक्रिः) बहुत कर्म करता (अद्भुतः) आश्चर्यरूप गुणकर्मस्वभाववाला (ब्रह्मणः,पतिः) धन कोष का रक्षक (अस्मै) इस विद्वान् के लिये (घृतवद्भिः) बहुत घृतादि पदार्थों से युक्त (हव्यैः) देने योग्य वस्तुओं से (अविधत्) शुभ कार्य साधक पदार्थ बनाता (तम्) उसको (प्राचा) प्राचीन विज्ञान से (प्र,नयति) अच्छे प्रकार प्राप्त होता (अंहसः) पाप से (रक्षति) बचाता (रिषः) हिंसकों को मारके (अस्मै) इस विद्वान् को (अंहोः) पापाचरणी से (उरुष्यति) पृथक् रखता वह (ईम्) सब ओर से सुख को प्राप्त होता है ॥४॥
Essence
जैसे घृत आदि पुष्ट और सुगन्धित द्रव्यों के होम से वायु और वृष्टिजल शुद्ध होके रोगों से प्राणियों को पृथक् कर सबको सुखी करते हैं वैसे उपदेशक लोग अधर्म के निषेधपूर्वक धर्म के ग्रहण से आत्माओं को शुद्ध कर अविद्यादि रोगों को दूर करते हैं, वे कृतकृत्य होते हैं ॥४॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छब्बीसवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।