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Rigveda Mandal 2 / Sukta 26 / Mantra 3

43 Sukta
4 Mantra
2/26/3
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स इज्जने॑न॒ स वि॒शा स जन्म॑ना॒ स पु॒त्रैर्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभिः॑। दे॒वानां॒ यः पि॒तर॑मा॒विवा॑सति श्र॒द्धाम॑ना ह॒विषा॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑म्॥

सः । इत् । जने॑न । सः । वि॒शा । सः । जन्म॑ना । सः । पु॒त्रैः । वाज॑म् । भ॒र॒ते॒ । धना॑ । नृऽभिः॑ । दे॒वाना॑म् । यः । पि॒तर॑म् । आ॒ऽविवा॑सति । श्र॒द्धाऽम॑नाः । ह॒विषा॑ । ब्रह्म॑णः । पति॑म् ॥

Mantra without Swara
स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं भरते धना नृभिः। देवानां यः पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम्॥

सः। इत्। जनेन। सः। विशा। सः। जन्मना। सः। पुत्रैः। वाजम्। भरते। धना। नृऽभिः। देवानाम्। यः। पितरम्। आऽविवासति। श्रद्धाऽमनाः। हविषा। ब्रह्मणः। पतिम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वान् जन जैसे (सः) वह (जनेन) साधारण मनुष्य के (सः) वह (विशा) प्रजा के (सः) वह (जन्मना) जन्म के और (सः) वह (पुत्रैः) सन्तानों के साथ (वाजम्) विज्ञान को तथा नृभि:) अधिकारी मनुष्यों से साथ (धना) धनों को (भरते) धारण करता (यः) जो (श्रद्धामनाः) मन में श्रद्धा रखनेवाला (हविषा) उत्तम व्यवहार ग्रहण के साथ (देवानाम्) विद्वानों के सम्बन्धी (ब्रह्मणः) वेद के (पतिम्) पालक रक्षक (पितरम्) पिता वा अध्यापक का (आविवासति) अच्छे प्रकार सेवन करता (इत्) वही शरीर और आत्मा के बल से युक्त हुआ सुखी होता है ॥३॥
Essence
जो मनुष्य प्रीतिपूर्वक विद्वानों के अध्यापक और उपदेशक विद्वान् का सेवन करते हैं, वे सर्वत्र सब पदार्थों से निष्पन्न हुए आनन्द को भोगते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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