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Rigveda Mandal 2 / Sukta 25 / Mantra 5

43 Sukta
5 Mantra
2/25/5
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तस्मा॒ इद्विश्वे॑ धुनयन्त॒ सिन्ध॒वोऽच्छि॑द्रा॒ शर्म॑ दधिरे पु॒रूणि॑। दे॒वानां॑ सु॒म्ने सु॒भगः॒ स ए॑धते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

तस्मै॑ । इत् । विश्वे॑ । धु॒न॒य॒न्त॒ । सिन्ध॑वः । अच्छि॑द्रा । शर्म॑ । द॒धि॒रे॒ । पु॒रूणि॑ । दे॒वाना॑म् । सु॒म्ने । सु॒ऽभगः॑ । सः । ए॒ध॒ते॒ । यम्ऽय॑म् । युज॑म् । कृ॒णु॒ते । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ ॥

Mantra without Swara
तस्मा इद्विश्वे धुनयन्त सिन्धवोऽच्छिद्रा शर्म दधिरे पुरूणि। देवानां सुम्ने सुभगः स एधते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः॥

तस्मै। इत्। विश्वे। धुनयन्त। सिन्धवः। अच्छिद्रा। शर्म। दधिरे। पुरूणि। देवानाम्। सुम्ने। सुऽभगः। सः। एधते। यम्ऽयम्। युजम्। कृणुते। ब्रह्मणः। पतिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (ब्रह्मणः) वेदविद्या का (पतिः) रक्षक प्रचार के विद्वान् मनुष्य (देवानाम्) विद्वानों के (सुम्ने) सुख में (सुभगः) सुन्दर ऐश्वर्यवाला प्रफुल्लित होता हुआ (यंयम्) जिस-जिसको (युजम्) शुभ कर्मयुक्त (कृणुते) करता है (सः) (एधते) वह उन्नति को प्राप्त होता (तस्मै,इत्) उसी के लिये (विश्वे) सब (सिन्धवः) समुद्रादि जलाशय (अच्छिद्रा) छेद-भेद रहित (पुरूणि) बहुत (शर्म) सुखदायी निवासस्थानों को (दधिरे) धारण करते तथा (धुनयन्त) सर्वत्र चलाते हैं अर्थात् यानादि द्वारा सर्वत्र निवास पाता है ॥५॥
Essence
जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में प्रीति रखने पदार्थों का संयोग विभाग करनेवाले रसायन विद्या में उद्योगी होवें, वे सब पदार्थों से बहुत कार्य सिद्ध कर सकते हैं ॥५॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त में कहे अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह पच्चीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब कौन मनुष्य कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।