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Rigveda Mandal 2 / Sukta 25 / Mantra 3

43 Sukta
5 Mantra
2/25/3
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ शिमी॑वाँ ऋघाय॒तो वृषे॑व॒ वध्रीँ॑र॒भि व॒ष्ट्योज॑सा। अ॒ग्नेरि॑व॒ प्रसि॑ति॒र्नाह॒ वर्त॑वे॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

सिन्धुः॑ । न । क्षोदः॑ । शिमी॑ऽवान् । ऋ॒घा॒य॒तः । वृषा॑ऽइव । वध्री॑न् । अ॒भि । व॒ष्टि॒ । ओज॑सा । अ॒ग्नेःऽइ॑व । प्रऽसि॑तिः । न । अ॑ह । वर्त॑वे । यम्ऽय॑म् । युज॑म् । कृ॒णु॒ते । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ ॥

Mantra without Swara
सिन्धुर्न क्षोदः शिमीवाँ ऋघायतो वृषेव वध्रीँरभि वष्ट्योजसा। अग्नेरिव प्रसितिर्नाह वर्तवे यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः॥

सिन्धुः। न। क्षोदः। शिमीऽवान्। ऋघायतः। वृषाऽइव। वध्रीन्। अभि। वष्टि। ओजसा। अग्नेःऽइव। प्रऽसितिः। न। अह। वर्तवे। यम्ऽयम्। युजम्। कृणुते। ब्रह्मणः। पतिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 3

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Meaning
जो (शिमीवान्) प्रशस्त कर्मयुक्त (ब्रह्मणः,पतिः) वेद का रक्षक विद्वान् पुरुष (क्षोदः) जलको (सिन्धुः,न) समुद्र जैसे अपने में लय करता (वध्रीन्) वा साधारण बैलों को (अभि) सन्मुख होके जैसे (वृषेव) अति बलवान् बैल मारता वैसे (ओजसा) बल से (घायतः) सत्य धर्म के नाशक शत्रुओं का नाश करता सत्य को (वष्टि) चाहता और (अग्नेरिव) अग्नि से जैसे (प्रसिति) बन्धन (वर्त्तवे) वर्त्तने के अर्थ (न,अह) नहीं रहता अर्थात् स्वाधीनता होती है वैसे (यंयम्) जिस-जिसको (युजम्) शुभ गुणयुक्त (कृणुते) करता है वह उसको सुखी करता है ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पुरुषार्थी समुद्र के तुल्य गम्भीर धनाढ्य वृषभ के तुल्य बलवान् अग्नि के तुल्य शत्रुओं के जलानेवाले सत्य कामनायुक्त होते हैं, वे समस्त शिल्प विद्या को सिद्ध कर सकते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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