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Rigveda Mandal 2 / Sukta 25 / Mantra 1

43 Sukta
5 Mantra
2/25/1
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्धा॑नो अ॒ग्निं व॑नवद्वनुष्य॒तः कृ॒तब्र॑ह्मा शूशुवद्रा॒तह॑व्य॒ इत्। जा॒तेन॑ जा॒तमति॒ स प्र स॑र्सृते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

इन्धा॑नः । अ॒ग्निम् । व॒न॒व॒त् । व॒नु॒ष्य॒तः । कृ॒तऽब्र॑ह्मा । शू॒शु॒व॒त् । रा॒तऽह॑व्यः । इत् । जा॒तेन॑ । जा॒तम् । अति॑ । सः । प्र । स॒र्सृ॒ते॒ । यम्ऽय॑म् । युज॑म् । कृ॒णु॒ते । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्धानो अग्निं वनवद्वनुष्यतः कृतब्रह्मा शूशुवद्रातहव्य इत्। जातेन जातमति स प्र सर्सृते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः॥

इन्धानः। अग्निम्। वनवत्। वनुष्यतः। कृतऽब्रह्मा। शूशुवत्। रातऽहव्यः। इत्। जातेन। जातम्। अति। सः। प्र। सर्सृते। यम्ऽयम्। युजम्। कृणुते। ब्रह्मणः। पतिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (कृतब्रह्मा) धनों को उत्पन्न करनेवाला (इन्धानः) तेजस्वी (रातहव्यः) होमके योग्य पदार्थों का दाता (ब्रह्मणः) धनका (पतिः) रक्षक स्वामी (जातेन) उत्पन्न हुए जगत् के साथ (जातम्) उत्पन्न पदार्थ को (अति,सर्सृते) अत्यन्त शीघ्र प्राप्त होता (यंयम्) जिस-जिसको (युजम्) कार्य्यों में युक्त (कृणुते) करता (सः,इत्) वही (वनवत्) वन को जैसे वैसे (वनुष्यतः) जलाते नष्ट करते हुए (अग्निम्) विद्युत् अग्नि को (प्र,शूशुवत्) अच्छे प्रकार जानता है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे किरण वायु के साथ चलती है, वैसे ही विद्युत् अग्नि सब पदार्थों के साथ चलता है, उसको मनुष्य जहाँ-जहाँ प्रयुक्त करे, वहाँ-वहाँ बड़े काम को सिद्ध करता है ॥१॥
Subject
अब पच्चीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके आदि में बिजली का वर्णन करते हैं।