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Rigveda Mandal 2 / Sukta 24 / Mantra 7

43 Sukta
16 Mantra
2/24/7
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ऋ॒तावा॑नः प्रति॒चक्ष्यानृ॑ता॒ पुन॒रात॒ आ त॑स्थुः क॒वयो॑ म॒हस्प॒थः। ते बा॒हुभ्यां॑ धमि॒तम॒ग्निमश्म॑नि॒ नकिः॒ षो अ॒स्त्यर॑णो ज॒हुर्हि तम्॥

ऋ॒तऽवा॑नः । प्र॒ति॒ऽचक्ष्य॑ । अनृ॑ता । पुनः॑ । आ । अतः॑ । आ । त॒स्थुः॒ । क॒वयः॑ । म॒हः । प॒थः । ते॒ । बा॒हुऽभ्या॑म् । ध॒मि॒तम् । अ॒ग्निम् । अस्म॑नि । नकिः॑ । सः । अ॒स्ति॒ । अर॑णः । जु॒हुः । हि । तम् ॥

Mantra without Swara
ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः। ते बाहुभ्यां धमितमग्निमश्मनि नकिः षो अस्त्यरणो जहुर्हि तम्॥

ऋतऽवानः। प्रतिऽचक्ष्य। अनृता। पुनः। आ। अतः। आ। तस्थुः। कवयः। महः। पथः। ते। बाहुऽभ्याम्। धमितम्। अग्निम्। अश्मनि। नकिः। सः। अस्ति। अरणः। जुहुः। हि। तम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (तावानः) सत्य आचरणों का सेवन करनेहारे (कवयः) पण्डित लोग (महः) बड़े धर्मयुक्त (पथः) मार्गों पर (आ,तस्थुः) अच्छे प्रकार स्थित होते (ते) हे (अतः) इस कारण से (पुनः) बार-बार (अनृता) अधर्मयुक्त व्यवहारों को (प्रतिचक्ष्य) खण्डित कर इनको (आ, जहुः) सब प्रकार छोड़ते हैं जो (अरणः) विज्ञानी (बाहुभ्याम्) हाथों से (अश्मनि) पत्थर पर (धमितम्) प्रज्वलित करके (अग्निम्) अग्नि को त्याग करता (नकिः) नहीं (अस्ति) अर्थात् ग्रहण करता है (सः, हि) वही (तम्) उस बोध को प्राप्त होता है ॥७॥
Essence
जो अविद्या और अधर्माचरण का खण्डन श्रेष्ठ मार्ग का सेवन करते हैं, वे हाथों से धौंपने से काष्ठादिस्थ अग्नि को उत्पन्न कर कार्यों को सिद्ध करते और अभीष्ट को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषयको अगले मन्त्र में कहा है।