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Rigveda Mandal 2 / Sukta 24 / Mantra 5

43 Sukta
16 Mantra
2/24/5
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सना॒ ता का चि॒द्भुव॑ना॒ भवी॑त्वा मा॒द्भिः श॒रद्भि॒र्दुरो॑ वरन्त वः। अय॑तन्ता चरतो अ॒न्यद॑न्य॒दिद्या च॒कार॑ व॒युना॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

सना॑ । ता । का । चि॒त् । भुव॑ना । भवी॑त्वा । मा॒त्ऽभिः । श॒रत्ऽभिः॑ । दुरः॑ । व॒र॒न्त॒ । वः॒ । अय॑तन्ता । च॒र॒तः॒ । अ॒न्यत्ऽअ॑न्यत् । इत् । या । च॒कार॑ । व॒युना॑ । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ ॥

Mantra without Swara
सना ता का चिद्भुवना भवीत्वा माद्भिः शरद्भिर्दुरो वरन्त वः। अयतन्ता चरतो अन्यदन्यदिद्या चकार वयुना ब्रह्मणस्पतिः॥

सना। ता। का। चित्। भुवना। भवीत्वा। मात्ऽभिः। शरत्ऽभिः। दुरः। वरन्त। वः। अयतन्ता। चरतः। अन्यत्ऽअन्यत्। इत्। या। चकार। वयुना। ब्रह्मणः। पतिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो जैसे सूर्य के किरण (माद्भिः) महीनों और (शरद्भिः) शरत् आदि तुओं के विभाग से (या) जो (सना) सनातन (का,चित्) कोई (भवीत्वा) होनेवाले (भुवना) लोक हैं (ता) उनको और (दुरः) द्वारों को (वरन्त) विवृत करते प्रकाशित करते हैं तथा जो (ब्रह्मणः, पतिः) विद्या और धन का पालक पुरुष (वः) तुमको (वयुना) विज्ञानयुक्त (चकार) करता है वह तुमको सेवने योग्य है जो (अयतन्ता) प्रयत्नरहित आलसी पढ़ने-पढ़ानेवाले (अन्यदन्यत्, इत्) अन्य-अन्य विरुद्ध ही (चरतः) करते हैं उनका सत्कार कभी न करना चाहिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य महीनों और तुओं को विभक्त कर मूर्त्त द्रव्यों का यथावत्स्वरूप दिखाता है, वैसे जो विद्वान् पृथिवी से लेके ईश्वरपर्यन्त पदार्थों को यथावत् शिक्षा से दिखावें, वे लोक में पूजनीय होवें और जो अविद्यायुक्त आलसी लोग कपट आदि से दूषित दुष्ट उपदेश करते वा निकम्मे बैठे रहते हैं, वे किसी को कभी सेवने योग्य नहीं हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।