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Rigveda Mandal 2 / Sukta 24 / Mantra 4

43 Sukta
16 Mantra
2/24/4
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अश्मा॑स्यमव॒तं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्मधु॑धारम॒भि यमोज॒सातृ॑णत्। तमे॒व विश्वे॑ पपिरे स्व॒र्दृशो॑ ब॒हु सा॒कं सि॑सिचु॒रुत्स॑मु॒द्रिण॑म्॥

अश्म॑ऽआस्यम् । अ॒व॒तम् । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ । मधु॑ऽधारम् । अ॒भि । यम् । ओज॑सा । अतृ॑णत् । तम् । ए॒व । विश्वे॑ । प॒पि॒रे॒ । स्वः॒ऽदृशः॑ । ब॒हु । सा॒कम् । सि॒सि॒चुः॒ । उत्स॑म् । उ॒द्रिण॑म् ॥

Mantra without Swara
अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातृणत्। तमेव विश्वे पपिरे स्वर्दृशो बहु साकं सिसिचुरुत्समुद्रिणम्॥

अश्मऽआस्यम्। अवतम्। ब्रह्मणः। पतिः। मधुऽधारम्। अभि। यम्। ओजसा। अतृणत्। तम्। एव। विश्वे। पपिरे। स्वःऽदृशः। बहु। साकम्। सिसिचुः। उत्सम्। उद्रिणम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
जो विद्वान् (ब्रह्मणः) बड़ों का (पतिः) रक्षक सज्जन जैसे सूर्य्य (ओजसा) बल के साथ (यम्) जिस (अवतम्) नीचे को गिरने हारे (मधुधारम्) मधुर रसों के धारक (अश्मास्यम्) मेघ के मुख्य भाग को (अभि,अतृणत्) सब ओर से काटता है (तमेव) उसी को (विश्वे) सब (स्वर्दृशः) सुख प्राप्ति के हेतु शिक्षक लोग (साकम्) साथ मिलके (उद्रिणम्) जलयुक्त (उत्सम्) कूप के तुल्य (बहु) अधिकतर (पपिरे) पियें और (सिसिचुः) सीचें वैसे अनुष्ठान करें ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य मेघ और कूप के तुल्य सब को शुभ शिक्षा से तृप्त करते और सबको एकमन करते हैं, वे मिलकर सबकी उन्नति कर सकते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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