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Rigveda Mandal 2 / Sukta 24 / Mantra 11

43 Sukta
16 Mantra
2/24/11
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
योऽव॑रे वृ॒जने॑ वि॒श्वथा॑ वि॒भुर्म॒हामु॑ र॒ण्वः शव॑सा व॒वक्षि॑थ। स दे॒वो दे॒वान्प्रति॑ पप्रथे पृ॒थु विश्वेदु॒ ता प॑रि॒भूर्ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

यः । अव॑रे । वृ॒जने॑ । वि॒श्वऽथा॑ । वि॒ऽभुः म॒हाम् । ऊँ॒ इति॑ । र॒ण्वः । शव॑सा । व॒वक्षि॑थ । सः । दे॒वः । दे॒वान् । प्रति॑ । प॒प्र॒थे॒ । पृ॒थु । विश्वा॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । ता । प॒रि॒ऽभूः । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ ॥

Mantra without Swara
योऽवरे वृजने विश्वथा विभुर्महामु रण्वः शवसा ववक्षिथ। स देवो देवान्प्रति पप्रथे पृथु विश्वेदु ता परिभूर्ब्रह्मणस्पतिः॥

यः। अवरे। वृजने। विश्वऽथा। विऽभुः महाम्। ऊँ इति। रण्वः। शवसा। ववक्षिथ। सः। देवः। देवान्। प्रति। पप्रथे। पृथु। विश्वा। इत्। ऊँ इति। ता। परिऽभूः। ब्रह्मणः। पतिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 1

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Meaning
(यः) जो (विश्वथा) सब (अवरे) कार्य्यरूप (वृजने) अनित्य जगत् में (रण्वः) रमण करानेहारा (विभुः) व्यापक (परिभूः) सब ओर प्रसिद्ध होनेवाला (ब्रह्मणः,पतिः) ब्रह्माण्ड का रक्षक है (सः) (देवः) वह दिव्यस्वरूप ईश्वर (शवसा) जल से (महाम्,उ) वितर्करूप महान् संसार को और (देवान्) विद्वानों का वसु आदि को (प्रति,पप्रथे) प्रीति के साथ प्रख्यात करता और (पृथु) विस्तीर्ण (ता) उन (विश्वा) समस्त जङ्गम प्राणियों को विस्तृत करता (इत्,उ) सभी को तुम लोग (ववक्षिथ) प्राप्त होने की इच्छा करो ॥११॥
Essence
हे मनुष्यो जो परमात्मा अगले पिछले कार्य्य कारणरूप जगत् में परिपूर्ण होके सबका विस्तार करता, सबके लिये सब सुखों के साधनों को देता, वही सबको उपासना करने और मानने योग्य है ॥११॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या कर्त्तव्य है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है।

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