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Rigveda Mandal 2 / Sukta 24 / Mantra 10

43 Sukta
16 Mantra
2/24/10
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि॒भु प्र॒भु प्र॑थ॒मं मे॒हना॑वतो॒ बृह॒स्पतेः॑ सुवि॒दत्रा॑णि॒ राध्या॑। इ॒मा सा॒तानि॑ वे॒न्यस्य॑ वा॒जिनो॒ येन॒ जना॑ उ॒भये॑ भुञ्ज॒ते विशः॑॥

वि॒ऽभु । प्र॒ऽभु । प्र॒थ॒मम् । मे॒हना॑ऽवतः । बृह॒स्पतेः॑ । सु॒ऽवि॒दत्रा॑णि । राध्या॑ । इ॒मा । सा॒तानि॑ । वे॒न्यस्य॑ । वा॒जिनः॑ । येन॑ । जनाः॑ । उ॒भये॑ । भु॒ञ्ज॒ते । विशः॑ ॥

Mantra without Swara
विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतो बृहस्पतेः सुविदत्राणि राध्या। इमा सातानि वेन्यस्य वाजिनो येन जना उभये भुञ्जते विशः॥

विऽभु। प्रऽभु। प्रथमम्। मेहनाऽवतः। बृहस्पतेः। सुऽविदत्राणि। राध्या। इमा। सातानि। वेन्यस्य। वाजिनः। येन। जनाः। उभये। भुञ्जते। विशः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
(येन) जिसके आश्रय से (उभये) विद्वान् अविद्वान् दोनों (जनाः) प्रसिद्ध पुरुष (विशः) धनों को (भुञ्जते) प्राप्त होते वह (प्रथमम्) प्रख्यात (विभु) व्यापक (प्रभु) समर्थ उपासना किया हुआ सिद्धिकारी होता है उसके (मेहनावतः) प्रशस्त वर्षाओं के निमित्तक (वाजिनः) प्राप्त होने वा (वेन्यस्य) चाहने (बृहस्पतेः) सबके रक्षक सूर्य के तुल्य प्रकाशयुक्त परमेश्वर के (सातानि) विभाग कर देने और (राध्या) सुखों को सिद्ध करने योग्य (सुविदत्राणि) सुन्दर विज्ञानों के (इमा) ये निमित्त सब लोगों को ग्रहण करने योग्य हैं ॥१०॥
Essence
राजजन और प्रजा जनों को योग्य है कि सर्वव्यापक शक्तिमान् विस्तीर्ण सुख देनेवाले ब्रह्म की उपासना कर सब मनुष्यादि प्राणियों के सुख साधक वस्तुओं को संग्रह करके राजप्रजा के सुखों को सिद्ध करें ॥१०॥
Subject
फिर राजा और प्रजा क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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