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Rigveda Mandal 2 / Sukta 24 / Mantra 1

43 Sukta
16 Mantra
2/24/1
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सेमाम॑विड्ढि॒ प्रभृ॑तिं॒ य ईशि॑षे॒ऽया वि॑धेम॒ नव॑या म॒हा गि॒रा। यथा॑ नो मी॒ढ्वान्त्स्तव॑ते॒ सखा॒ तव॒ बृह॑स्पते॒ सीष॑धः॒ सोत नो॑ म॒तिम्॥

सः । इ॒माम् । अ॒वि॒ड्ढि॒ । प्रऽभृ॑तिम् । यः । ईशि॑षे । अ॒या । वि॒धे॒म॒ । नव॑या । म॒हा । गि॒रा । यथा॑ । नः॒ । मी॒ढ्वान् । स्तव॑ते । सखा॑ । तव॑ । बृह॑स्पते । सीस॑धः । सः । उ॒त । नः॒ । म॒तिम् ॥

Mantra without Swara
सेमामविड्ढि प्रभृतिं य ईशिषेऽया विधेम नवया महा गिरा। यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव बृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम्॥

सः। इमाम्। अविड्ढि। प्रऽभृतिम्। यः। ईशिषे। अया। विधेम। नवया। महा। गिरा। यथा। नः। मीढ्वान्। स्तवते। सखा। तव। बृहस्पते। सीसधः। सः। उत। नः। मतिम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 1

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Meaning
हे (बृहस्पते) अध्यापक वेदरूप वाणी के शिक्षक विद्वान् (यः) जो आप (अया) इस (नवया) नवीन (महा,गिरा) महती उपदेशरूप वाणी से (इमाम्) इस (प्रभृतिम्) धारण वा पोषण रूप क्रिया के करने को (ईशिषे) समर्थ हो (सः) सो आप इस उक्त क्रिया को (अविड्ढि) प्राप्त हूजिये (यथा) जैसे (तव) आपका (मीढ्वान्) विद्या का प्रवर्तक (सखा) मित्र (नः) हमारी (स्तवते) प्रशंसा करता और जैसे (सः) वह आप (नः) हमारे लिये (मतिम्) बुद्धि को (उत) भी (सीषधः) सिद्ध करो वैसे आपको आपके मित्र को हम लोग (विधेम) प्राप्त हों ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो लोग विद्या की उन्नति करना चाहें, वे प्रथम वेदादि शास्त्रों को स्वयं पढ़के दूसरों को प्रयत्न के साथ पढावें और पढ़ पढ़ा के पदार्थविज्ञान में आरूढ़ बुद्धि को प्राप्त हों ॥१॥
Subject
अब द्वितीयाष्टक के सातवें अध्याय का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है।

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