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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 8

43 Sukta
19 Mantra
2/23/8
Devata- बृहस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्रा॒तारं॑ त्वा त॒नूनां॑ हवाम॒हेऽव॑स्पर्तरधिव॒क्तार॑मस्म॒युम्। बृह॑स्पते देव॒निदो॒ नि ब॑र्हय॒ मा दु॒रेवा॒ उत्त॑रं सु॒म्नमुन्न॑शन्॥

त्रा॒तार॑म् । त्वा॒ । त॒नूना॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ । अव॑ऽस्पर्तः । अ॒धि॒ऽव॒क्तार॑म् । अ॒स्म॒युम् । बृह॑स्पते । दे॒व॒ऽनिदः॑ । नि । ब॒र्ह॒य॒ । मा । दुः॒ऽएवाः॑ । उत्ऽत॑रम् । सु॒म्नम् । उत् । न॒श॒न् ॥

Mantra without Swara
त्रातारं त्वा तनूनां हवामहेऽवस्पर्तरधिवक्तारमस्मयुम्। बृहस्पते देवनिदो नि बर्हय मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन्॥

त्रातारम्। त्वा। तनूनाम्। हवामहे। अवऽस्पर्तः। अधिऽवक्तारम्। अस्मयुम्। बृहस्पते। देवऽनिदः। नि। बर्हय। मा। दुःऽएवाः। उत्ऽतरम्। सुम्नम्। उत्। नशन्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 30 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अवस्पर्त्तः) रक्षा कर दुःख से पार करने और (बृहस्पते) बड़ों की रक्षा करनेवाले हम लोग जिस (तनूनाम्) विस्तृत सुखसाधक शरीरादिकों वा अन्य पदार्थों के (त्रातारम्) रक्षा करने वा (अस्मयुम्) हम लोगों की कामना करने वा (अधिवक्तारम्) सबके ऊपर उपदेश करनेवाले (त्वा) आप जगदीश्वर वा सभापति को (हवामहे) स्वीकार करते हैं सो आप (देवनिदः) जो विद्वान् वा दिव्य गुणों की निन्दा करते उनको (नि,बर्हय) निरन्तर छिन्न-भिन्न करो, जिससे (दुरेवाः) दुष्टाचरण करनेवाले (उत्तरम्) उसके उपरान्त (सुम्नम्) सुख को (मा,उत् नशन्) मत नष्ट करावें ॥८॥
Essence
जो अपना उपदेश करने और रक्षा करनेवाला परमात्मा वा आप्त विद्वान् मानते हैं, वे सब ओर से बढ़ते हैं। जो विद्वान् ईश्वर और वेद की निन्दा भविष्यत् का आनन्द नष्ट करनेवाले हों, उनको सब ओर से निवृत्त करावें ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।