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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 6

43 Sukta
19 Mantra
2/23/6
Devata- बृहस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ गो॒पाः प॑थि॒कृद्वि॑चक्ष॒णस्तव॑ व्र॒ताय॑ म॒तिभि॑र्जरामहे। बृह॑स्पते॒ यो नो॑ अ॒भि ह्वरो॑ द॒धे स्वा तं म॑र्मर्तु दु॒च्छुना॒ हर॑स्वती॥

त्वम् । नः॒ । गो॒ऽपाः । प॒थि॒ऽकृत् । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । तव॑ । व्र॒ताय॑ । म॒तिऽभिः॑ । ज॒रा॒म॒हे॒ । बृह॑स्पते । यः । नः॒ । अ॒भि । ह्वरः॑ । द॒धे । स्वा । तम् । म॒र्म॒र्तु॒ । दु॒च्छुना॑ । हर॑स्वती ॥

Mantra without Swara
त्वं नो गोपाः पथिकृद्विचक्षणस्तव व्रताय मतिभिर्जरामहे। बृहस्पते यो नो अभि ह्वरो दधे स्वा तं मर्मर्तु दुच्छुना हरस्वती॥

त्वम्। नः। गोऽपाः। पथिऽकृत्। विऽचक्षणः। तव। व्रताय। मतिऽभिः। जरामहे। बृहस्पते। यः। नः। अभि। ह्वरः। दधे। स्वा। तम्। मर्मर्तु। दुच्छुना। हरस्वती॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 30 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (बृहस्पते) बहुत सत्य का प्रचार करनेवाले (यः) जो (नः) हमलोगों के ऊपर (ह्वरः) क्रोध किया जाता वह (दुच्छुना) दुष्ट कुत्ते से जैसे-तैसे (तम्) उसको (मर्मर्त्तु) निरन्तर प्राप्त हो जो (स्वा) अपनी (हरस्वती) बहुतों को हरने का शील रखनेवाली सेना उस विषय को (अभि,दधे) सब ओर से धारण करे उस सेना से जो (नः) हम लोगों के (गोपाः) रक्षा करने (पथिकृत्) सकल सुकृत मार्ग का प्रचार करने वा (विचक्षणः) विविध सत्योपदेश करनेवाले (त्वम्) आप हैं उन (तव) आपके (व्रताय) शील के लिये (मतिभिः) मेधाओं के साथ हम लोग (जरामहे) स्तुति करते हैं ॥६॥
Essence
जिनका मार्ग प्रकाश करने और उपदेश करनेवाला परमात्मा विद्वान् होता है, जो सत्पुरुषों के सङ्ग के प्रीति करनेवाले वर्त्तमान हैं, उनको क्रोध आदि दुर्गुण नहीं प्राप्त होते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।