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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 4

43 Sukta
19 Mantra
2/23/4
Devata- बृहस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सु॒नी॒तिभि॑र्नयसि॒ त्राय॑से॒ जनं॒ यस्तुभ्यं॒ दाशा॒न्न तमंहो॑ अश्नवत्। ब्र॒ह्म॒द्विष॒स्तप॑नो मन्यु॒मीर॑सि॒ बृह॑स्पते॒ महि॒ तत्ते॑ महित्व॒नम्॥

सु॒नी॒तिऽभिः॑ । न॒य॒सि॒ । त्राय॑से । जन॑म् । यः । तुभ्य॑म् । दाशा॑त् । न । तम् । अंहः॑ । अ॒श्न॒व॒त् । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषः॑ । तप॑नः । म॒न्यु॒ऽमीः । अ॒सि॒ । बृह॑स्पते । महि॑ । तत् । ते॒ । म॒हि॒ऽत्व॒नम् ॥

Mantra without Swara
सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान्न तमंहो अश्नवत्। ब्रह्मद्विषस्तपनो मन्युमीरसि बृहस्पते महि तत्ते महित्वनम्॥

सुनीतिऽभिः। नयसि। त्रायसे। जनम्। यः। तुभ्यम्। दाशात्। न। तम्। अंहः। अश्नवत्। ब्रह्मऽद्विषः। तपनः। मन्युऽमीः। असि। बृहस्पते। महि। तत्। ते। महिऽत्वनम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 4

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Meaning
हे (बृहस्पते) बड़ों की पालना करनेवाले ईश्वर वा विद्वान् आप (सुनीतिभिः) उत्तमधर्मवाले न्याय मार्गों से जिस (जनम्) जन को (नयसि) पहुँचाते हो और (त्रायसे) रक्षा करते हो (यः) जो (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (आत्मा) (दाशात्) देता है (तम्) उसको (अंहः) पाप (न,अश्नवत्) नहीं प्राप्त होता जो तुम (ब्रह्मद्विषः) वेद और ईश्वर के विरोधियों पर (तपनः) ताप करनेवाले (मन्युमीः) क्रोध का मान करनेवाले (असि) हैं (ते) आपके (तत्) उस (महित्वनम्) बडप्पन की हम लोग प्रशंसा करें ॥४॥
Essence
जो मनुष्य सत्यभाव से जगदीश्वर वा आप्त विद्वान् के सम्बन्ध में अपने आत्मा को चलाते हैं, उनको जगदीश्वर वा धार्मिक विद्वान् पापाचरण से निवृत्त कर शुभ गुण-कर्म-स्वभावों से युक्त कर पवित्र उत्पन्न करता है और जो वेद वा ईश्वर के विरोधी पापाचारी हैं, उनको अधोगति को पहुँचाता है, यही इन दोनों की उपासना और संग से लाभ होता है ॥४॥
Subject
अब विद्वान् और ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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