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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 19

43 Sukta
19 Mantra
2/23/19
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब्रह्म॑णस्पते॒ त्वम॒स्य य॒न्ता सू॒क्तस्य॑ बोधि॒ तन॑यं च जिन्व। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

ब्रह्म॑णः । प॒ते॒ । त्वम् । अ॒स्य । य॒न्ता । सु॒ऽउ॒क्तस्य॑ । बो॒धि॒ । तन॑यम् । च॒ । जि॒न्व॒ । विश्व॑म् । तत् । भ॒द्रम् । यत् । अव॑न्ति । दे॒वाः । बृ॒हत् । व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥

Mantra without Swara
ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व। विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥

ब्रह्मणः। पते। त्वम्। अस्य। यन्ता। सुऽउक्तस्य। बोधि। तनयम्। च। जिन्व। विश्वम्। तत्। भद्रम्। यत्। अवन्ति। देवाः। बृहत्। वदेम। विदथे। सुऽवीराः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 32 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ब्रह्मणस्पते) ब्रह्माण्ड की पालना करने हारे (त्वम्) आप (अस्य,सूक्तस्य) जो यह सुन्दरता से कहा जाता इसके (यन्ता) नियन्ता होते हुए (तनयम्) संतान के समान (बोधि) जानो (च) और इस (विश्वम्) सब को (जिन्व) प्रसन्न करो तथा (देवाः) विद्वान् जन (यत्) जिस (भद्रम्) कल्याण करनेवाले की (अवन्ति) रक्षा करते हैं (तत्) उस (बृहत्) बहुत (विदथे) संग्राम में (सुवीराः) अच्छे वीरोंवाले हम लोग (वदेम) कहें ॥१९॥
Essence
ईश्वर ने जो रक्षितव्य कहा है, उसकी अच्छे प्रकार रक्षा कर मनुष्यों को बहुत सुख पाना चाहिये। जैसे ईश्वर समस्त जगत् की नियमपूर्वक रक्षा करता है, वैसे विद्वानों को भी सबकी रक्षा करनी चाहिये ॥१९॥ इस सूक्त में ईश्वरादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह तेईसवाँ सूक्त और बत्तीसवाँ वर्ग तथा छठा अध्याय समाप्त हुआ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।