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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 17

43 Sukta
19 Mantra
2/23/17
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वे॑भ्यो॒ हि त्वा॒ भुव॑नेभ्य॒स्परि॒ त्वष्टाज॑न॒त्साम्नः॑साम्नः क॒विः। स ऋ॑ण॒चिदृ॑ण॒या ब्रह्म॑ण॒स्पति॑र्द्रु॒हो ह॒न्ता म॒ह ऋ॒तस्य॑ ध॒र्तरि॑॥

विश्वे॑भ्यः । हि । त्वा॒ । भुव॑नेभ्यः । परि॑ । त्वष्टा॑ । अज॑नत् । साम्नः॑ऽसाम्नः । क॒विः । सः । ऋ॒ण॒ऽचित् । ऋ॒ण॒ऽयाः । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ । द्रु॒हः । ह॒न्ता । म॒हः । ऋ॒तस्य॑ । ध॒र्तरि॑ ॥

Mantra without Swara
विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नःसाम्नः कविः। स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि॥

विश्वेभ्यः। हि। त्वा। भुवनेभ्यः। परि। त्वष्टा। अजनत्। साम्नःऽसाम्नः। कविः। सः। ऋणऽचित्। ऋणऽयाः। ब्रह्मणः। पतिः। द्रुहः। हन्ता। महः। ऋतस्य। धर्तरि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 32 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वान् जो (साम्नःसाम्नः) सामवेद सामवेदमात्र के बीच (कविः) सर्वज्ञ (त्वष्टा) पदार्थों का निर्माण करनेवाला (विश्वेभ्यः) सभी (भुवनेभ्यः) लोकों से जिन (त्वा) आपको (पर्यजनत्) सब प्रकार प्रकट करता है (सः) वह (ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्माण्ड की पालना करनेवाला है उस (महः) महान् (तस्य) सत्य कारण के (धर्त्तरि) धारण करनेवाले जगदीश्वर में स्थित (णचित्) ण को इकट्ठा करने और (णयाः) णको प्राप्त होनेवाले आप (द्रुहः) द्रोह करनेवाले के (हन्ता) नाशक हूजिये ॥१७॥
Essence
हे जीव जो सर्वज्ञ सृष्टिकर्त्ता सकल भुवनों का एक स्वामी और सबका धारणकरनेवाला जगदीश्वर है, उसकी आज्ञा में स्थित द्रोहादिकों को दूर से दूर करे ॥१७॥
Subject
अब ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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