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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 14

43 Sukta
19 Mantra
2/23/14
Devata- बृहस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तेजि॑ष्ठया तप॒नी र॒क्षस॑स्तप॒ ये त्वा॑ नि॒दे द॑धि॒रे दृ॒ष्टवी॑र्यम्। आ॒विस्तत्कृ॑ष्व॒ यदस॑त्त उ॒क्थ्यं१॒॑ बृह॑स्पते॒ वि प॑रि॒रापो॑ अर्दय॥

तेजि॑ष्ठया । त॒प॒नी । र॒क्षसः॑ । त॒प॒ । ये । त्वा॒ । नि॒दे । द॒धि॒रे । दृ॒ष्टऽवी॑र्यम् । आ॒विः । तत् । कृ॒ष्व॒ । यत् । अस॑त् । ते॒ । उ॒क्थ्य॑म् । बृह॑स्पते । वि । प॒रि॒ऽरपः॑ । अ॒र्द॒य॒ ॥

Mantra without Swara
तेजिष्ठया तपनी रक्षसस्तप ये त्वा निदे दधिरे दृष्टवीर्यम्। आविस्तत्कृष्व यदसत्त उक्थ्यं१ बृहस्पते वि परिरापो अर्दय॥

तेजिष्ठया। तपनी। रक्षसः। तप। ये। त्वा। निदे। दधिरे। दृष्टऽवीर्यम्। आविः। तत्। कृष्व। यत्। असत्। ते। उक्थ्यम्। बृहस्पते। वि। परिऽरपः। अर्दय॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 31 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (बृहस्पते) बड़ों की पालना करनेवाले (ये) जो (दृष्टवीर्यम्) देखा है पराक्रम जिसका ऐसे (त्वा) तुझको (निदे) निन्दा के लिये (दधिरे) धारण करते उन (रक्षसः) राक्षसों को जो (तपनी) तपानेवाली है उस (तेजिष्ठया) अतीव तेजस्विनी से आप (तप) प्रताप दिखाओ (यत्) जो (ते) आपका (उक्थ्यम्) कहने योग्य प्रस्ताव (असत्) हो (तत्) उसको (आविष्कृष्व) प्रकट कीजिए (परिरापः) और सब ओर से पाप जिसके विद्यमान उसको (वि,अर्द्दय) विशेषता से नाशिये ॥१४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि निन्दकों की सर्वथा निवारि और स्तुति करनेवालों को बढ़ाय सत्यविद्याओं का प्रकाश करें ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।