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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 13

43 Sukta
19 Mantra
2/23/13
Devata- बृहस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
भरे॑षु॒ हव्यो॒ नम॑सोप॒सद्यो॒ गन्ता॒ वाजे॑षु॒ सनि॑ता॒ धनं॑धनम्। विश्वा॒ इद॒र्यो अ॑भिदि॒प्स्वो॒३॒॑मृधो॒ बृह॒स्पति॒र्वि व॑वर्हा॒ रथाँ॑इव॥

भरे॑षु । हव्य॑ । नम॑सा । उ॒प॒ऽसद्यः॑ । गन्ता॑ । वाजे॑षु । सनि॑ता । धन॑म्ऽधनम् । विश्वाः॑ । इत् । अ॒र्यः । अ॒भि॒ऽदि॒प्स्वः॑ । मृधः॑ । बृह॒स्पतिः॑ । वि । व॒व॒र्ह॒ । रथा॑न्ऽइव ॥

Mantra without Swara
भरेषु हव्यो नमसोपसद्यो गन्ता वाजेषु सनिता धनंधनम्। विश्वा इदर्यो अभिदिप्स्वो३मृधो बृहस्पतिर्वि ववर्हा रथाँइव॥

भरेषु। हव्य। नमसा। उपऽसद्यः। गन्ता। वाजेषु। सनिता। धनम्ऽधनम्। विश्वाः। इत्। अर्यः। अभिऽदिप्स्वः। मृधः। बृहस्पतिः। वि। ववर्ह। रथान्ऽइव॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 31 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (हव्यः) ग्रहण करने और (नमसा) सत्कार से (उपसद्यः) प्राप्त होने योग्य तथा (गन्ता) गमन करने (सनिता) विभाग करने (बृहस्पतिः) और पूज्यों की रक्षा करनेवाला (अर्य्यः) स्वामी (भरेषु) पुष्टियों और (वाजेषु) सङ्ग्रामों में (धनन्धनम्) धन-धन को बढ़ाता वा (रथानिव) रथों के समान (विश्वाः) समस्त (इत्) उन्हीं क्रियाओं को कि (अभिदिप्स्वः) जिनमें दम्भ की इच्छा करनेवाले विद्यमान तथा (मृधः) सङ्ग्रामों को (वि,ववर्ह) नहीं बढ़ाता है, वह राज्य करने को योग्य होता है ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो गुण-कर्म और स्वभावों से विजय को प्राप्त होते हुए विमानादि यानों के तुल्य शीघ्र ऐश्वर्य को प्राप्त होकर समस्त सत्कर्मों में विभाग कर धनादि पदार्थों को देते हैं, वे न्यायाधीश होने के योग्य हैं ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।