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Rigveda Mandal 2 / Sukta 23 / Mantra 11

43 Sukta
19 Mantra
2/23/11
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ना॒नु॒दो वृ॑ष॒भो जग्मि॑राह॒वं निष्ट॑प्ता॒ शत्रुं॒ पृत॑नासु सास॒हिः। असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒या ब्र॑ह्मणस्पत उ॒ग्रस्य॑ चिद्दमि॒ता वी॑ळुह॒र्षिणः॑॥

अ॒न॒नु॒ऽदः । वृ॒ष॒भः । जग्मिः॑ । आ॒ऽह॒वम् । निःऽत॑प्ता । शत्रु॑म् । पृत॑नासु । स॒स॒हिः । असि॑ । स॒त्यः । ऋ॒ण॒ऽयाः । ब्र॒ह्म॒णः॒ । प॒ते॒ । उ॒ग्रस्य॑ । चि॒त् । द॒मि॒ता । वी॒ळु॒ऽह॒र्षिणः॑ ॥

Mantra without Swara
अनानुदो वृषभो जग्मिराहवं निष्टप्ता शत्रुं पृतनासु सासहिः। असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिद्दमिता वीळुहर्षिणः॥

अनानुऽदः। वृषभः। जग्मिः। आऽहवम्। निःऽतप्ता। शत्रुम्। पृतनासु। ससहिः। असि। सत्यः। ऋणऽयाः। ब्रह्मणः। पते। उग्रस्य। चित्। दमिता। वीळुऽहर्षिणः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 31 Mantra » 1

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Meaning
हे (ब्रह्मणस्पते) वेद के पालनेवाले आप जिससे (अनानुदः) अनानुद अर्थात् जो पीछे देते हैं वे जिस के नहीं विद्यमान वह (वृषभः) श्रेष्ठजन (आहवम्) सङ्ग्रामको (जग्मिः) जानेवाले (पृतनासु) वीरों की सेनाओं में (शत्रुम्) काटने दुःख देनेवाले वैरी को (निष्टप्ता) निरन्तर सन्ताप देने (सासहिः) निरन्तर सहने (णयाः) और ण को प्राप्त होनेवाले (सत्यः) सज्जनों में साधु (वीळुहर्षिणः) जिसको बल से बहुत हर्ष विद्यमान (उग्रस्य) तीव्र को (चित्) ही (दमिता) दमन करनेवाले (असि) हैं उससे प्रशंसनीय होते हैं ॥११॥
Essence
जो देने योग्य पदार्थ को शीघ्र देते, जाने योग्य स्थान को जाते, पाने योग्य पदार्थ को पाते और दण्ड देने योग्य को दण्ड देते हैं, वे सत्य ग्रहण कर सकते हैं ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।