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Rigveda Mandal 2 / Sukta 21 / Mantra 6

43 Sukta
6 Mantra
2/21/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि॒ चित्तिं॒ दक्ष॑स्य सुभग॒त्वम॒स्मे। पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं त॒नूनां॑ स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः सु॑दिन॒त्वमह्ना॑म्॥

इन्द्र॑ । ष्रेष्ठा॑नि । द्रवि॑णानि । धे॒हि॒ । चित्ति॑म् । दक्ष॑स्य । सु॒ऽभ॒ग॒त्वम् । अ॒स्मे इति॑ । पोष॑म् । र॒यी॒णाम् । अरि॑ष्टिम् । त॒नूना॑म् । स्वा॒द्मान॑म् । वा॒चः । सु॒दि॒न॒ऽत्वम् । अह्ना॑म् ॥

Mantra without Swara
इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे। पोषं रयीणामरिष्टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम्॥

इन्द्र। ष्रेष्ठानि। द्रविणानि। धेहि। चित्तिम्। दक्षस्य। सुऽभगत्वम्। अस्मे इति। पोषम्। रयीणाम्। अरिष्टिम्। तनूनाम्। स्वाद्मानम्। वाचः। सुदिनऽत्वम्। अह्नाम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सभों के अधिपति के समान वर्त्तमान (अस्मे) हम लोगों के लिये (दक्षस्य) बल की (चित्तिम्) उस प्रकृति को जिससे कि विद्या को इकट्ठा करते हैं और (सुभगत्वम्) अत्युत्तम ऐश्वर्य (पोषम्) पुष्टि तथा (रयीणाम्) धन और (तनूनाम्) शरीरों की (अरिष्टिम्) रक्षा (वाचः) वाणी के बोध (स्वाद्मानम्) स्वादिष्ट भोग (अह्नाम्) दिनों के (सुदिनत्वम्) सुदिनपन और (श्रेष्ठानि) धर्मज्ञ (द्रविणानि) धनों को (धेहि) धारण कीजिये ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को जैसे परमेश्वर ने समस्त वस्तुओं को उत्पन्न कर सबके लिये हित रूप सिद्ध कराई हैं, वैसे सबके कल्याण के लिये नित्य प्रयत्न करना चाहिये ॥६॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥ यह इक्कीसवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।