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Rigveda Mandal 2 / Sukta 21 / Mantra 5

43 Sukta
6 Mantra
2/21/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
य॒ज्ञेन॑ गा॒तुम॒प्तुरो॑ विविद्रिरे॒ धियो॑ हिन्वा॒ना उ॒शिजो॑ मनी॒षिणः॑। अ॒भि॒स्वरा॑ नि॒षदा॒ गा अ॑व॒स्यव॒ इन्द्रे॑ हिन्वा॒ना द्रवि॑णान्याशत॥

य॒ज्ञेन॑ । गा॒तुम् । अ॒प्ऽतुरः॑ । वि॒वि॒द्रि॒रे॒ । धियः॑ । हि॒न्वा॒नाः । उ॒शिजः॑ । म॒नी॒षिणः॑ । अ॒भि॒ऽस्वरा॑ । नि॒ऽसदा॑ । गाः । अ॒व॒स्यवः॑ । इन्द्रे॑ । हि॒न्वा॒नाः । द्रवि॑णानि । आ॒श॒त॒ ॥

Mantra without Swara
यज्ञेन गातुमप्तुरो विविद्रिरे धियो हिन्वाना उशिजो मनीषिणः। अभिस्वरा निषदा गा अवस्यव इन्द्रे हिन्वाना द्रविणान्याशत॥

यज्ञेन। गातुम्। अप्ऽतुरः। विविद्रिरे। धियः। हिन्वानाः। उशिजः। मनीषिणः। अभिऽस्वरा। निऽसदा। गाः। अवस्यवः। इन्द्रे। हिन्वानाः। द्रविणानि। आशत॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (गातुम्) पृथिवी को (अप्तुरः) प्राप्त हुए (अभिस्वरा) सब ओर की वाणियों और (निषदा) नित्य जो सभा में स्थित होते उनसे (गाः) पृथिवियों को (अवस्यवः) अपनी रक्षारूप माननेवाले (इन्द्रे) बिजली आदि पदार्थ में (हिन्वानाः) वृद्धि को प्राप्त होते (उषिजः) मनोहर (धियः) बुद्धियों को (हिन्वानाः) बढ़ाते हुए (मनीषिणः) मनीषी जन (यज्ञेन) यज्ञ से विद्या और सुन्दर शील को (विविद्रिरे) प्राप्त होते हैं वे (द्रविणानि) धन वा यशों को (आशत) प्राप्त होते हैं ॥५॥
Essence
कोई भी जन सत्संग-योगाभ्यास-विद्या और उत्तम बुद्धि के बिना पूर्ण विद्या और धन पाने को योग्य नहीं होता है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।