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Rigveda Mandal 2 / Sukta 20 / Mantra 8

43 Sukta
9 Mantra
2/20/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तस्मै॑ तव॒स्य१॒॑मनु॑ दायि स॒त्रेन्द्रा॑य दे॒वेभि॒रर्ण॑सातौ। प्रति॒ यद॑स्य॒ वज्रं॑ बा॒ह्वोर्धुर्ह॒त्वी दस्यू॒न्पुर॒ आय॑सी॒र्नि ता॑रीत्॥

तस्मै॑ । त॒व॒स्य॑म् । अनु॑ । दा॒यि॒ । स॒त्रा । इन्द्रा॑य । दे॒वेभिः॑ । अर्ण॑ऽसातौ । प्रति॑ । यत् । अ॒स्य॒ । वज्र॑म् । बा॒ह्वोः । धुः । ह॒त्वी । दस्यू॑न् । पुरः॑ । आय॑सीः । नि । ता॒री॒त् ॥

Mantra without Swara
तस्मै तवस्य१मनु दायि सत्रेन्द्राय देवेभिरर्णसातौ। प्रति यदस्य वज्रं बाह्वोर्धुर्हत्वी दस्यून्पुर आयसीर्नि तारीत्॥

तस्मै। तवस्यम्। अनु। दायि। सत्रा। इन्द्राय। देवेभिः। अर्णऽसातौ। प्रति। यत्। अस्य। वज्रम्। बाह्वोः। धुः। हत्वी। दस्यून्। पुरः। आयसीः। नि। तारीत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (बाह्वोः) भुजाओं के (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्र को धारण (दस्यून्) और भयंकर चोरों को (हत्वी) हननकर (आयसीः) सुवर्ण और लोह के काम की (पुरः) नगरियों को (नि,तारीत्) उल्लङ्घता रहे वह और जिससे (अस्य) इस मेघ के (अर्णसातौ) जल की प्राप्ति के निमित्त (तवस्यम्) जल में उत्पन्न हुआ पदार्थ (अनुदायि) दिया जाए (तस्मै) उस प्रस्तुति प्रशंसा करने और (इन्द्राय) बहुत ऐश्वर्य के देनेवाले के लिये जो (सत्रा) सत्यता से प्रति (धुः) प्रतीति से धारण करें वे सब (देवेभिः) विद्वानों के साथ सुख पाते हैं ॥८॥
Essence
जो परिधियों के सहित नगरियों को बनाये और भयंकर चोर आदि को निवारण कर विद्वानों के साथ राज्य की पालना करते हैं, वे सत्य सुख को प्राप्त होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।