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Rigveda Mandal 2 / Sukta 20 / Mantra 7

43 Sukta
9 Mantra
2/20/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स वृ॑त्र॒हेन्द्रः॑ कृ॒ष्णयो॑नीः पुरंद॒रो दासी॑रैरय॒द्वि। अज॑नय॒न्मन॑वे॒ क्षाम॒पश्च॑ स॒त्रा शंसं॒ यज॑मानस्य तूतोत्॥

सः । वृ॒त्र॒ऽहा । इन्द्रः॑ । कृ॒ष्णऽयो॑नीः । पु॒र॒म्ऽद॒रः । दासीः॑ । ऐ॒र॒य॒त् । वि । अज॑नयत् । मन॑वे । क्षा॒म॒ऽपः । च॒ । स॒त्रा । शंस॑म् । यज॑मानस्य । तू॒तो॒त् ॥

Mantra without Swara
स वृत्रहेन्द्रः कृष्णयोनीः पुरंदरो दासीरैरयद्वि। अजनयन्मनवे क्षामपश्च सत्रा शंसं यजमानस्य तूतोत्॥

सः। वृत्रऽहा। इन्द्रः। कृष्णऽयोनीः। पुरम्ऽदरः। दासीः। ऐरयत्। वि। अजनयत्। मनवे। क्षामऽपः। च। सत्रा। शंसम्। यजमानस्य। तूतोत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् (सः) सो आप जैसे (पुरन्दरः) पुर का विदीर्ण करनेवाला (वृत्रहा) मेघहन्ता (इन्द्रः) सूर्य (कृष्णयोनीः) खींचनेवाली जिनकी योनी उन (दासीः) सुख देनेवाली घटाओं को (व्यैरयत्) विशेषता से प्रेरणा दे (मनवे) मनुष्य के लिये (क्षाम्) भूमि को (अपः,च) और जलों को (अजनयत्) उत्पन्न करे (यजमानस्य) देनेवाले के (सत्रा) सत्य में (शंसम्) स्तुति को (तूतोत्) बढ़ावे वैसे वर्त्तो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान सुख वर्षानेवाले न्याय के प्रकाश करने और सब प्रशंसकों के प्रशंसा करनेवाले हैं, वे यहाँ क्यों न बढ़ें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।