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Rigveda Mandal 2 / Sukta 2 / Mantra 1

43 Sukta
13 Mantra
2/2/1
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
य॒ज्ञेन॑ वर्धत जा॒तवे॑दसम॒ग्निं य॑जध्वं ह॒विषा॒ तना॑ गि॒रा। स॒मि॒धा॒नं सु॑प्र॒यसं॒ स्व॑र्णरं द्यु॒क्षं होता॑रं वृ॒जने॑षु धू॒र्षद॑म्॥

य॒ज्ञेन॑ । व॒र्ध॒त॒ । जा॒तऽवे॑दसम् । अ॒ग्निम् । य॒ज॒ध्व॒म् । ह॒विषा॑ । तना॑ । गि॒रा । स॒म्ऽइ॒धा॒नम् । सु॒ऽप्र॒यस॑म् । स्वः॑ऽनरम् । द्यु॒क्षम् । होता॑रम् । वृ॒जने॑षु । धूः॒ऽसद॑म् ॥

Mantra without Swara
यज्ञेन वर्धत जातवेदसमग्निं यजध्वं हविषा तना गिरा। समिधानं सुप्रयसं स्वर्णरं द्युक्षं होतारं वृजनेषु धूर्षदम्॥

यज्ञेन। वर्धत। जातऽवेदसम्। अग्निम्। यजध्वम्। हविषा। तना। गिरा। सम्ऽइधानम्। सुऽप्रयसम्। स्वःऽनरम्। द्युक्षम्। होतारम्। वृजनेषु। धूःऽसदम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! तुम (तना) विस्तृत (गिरा) वाणी से (वृजनेषु) जिन मार्गों में जन जाते हैं उनमें (धूर्षदम्) विमानादिकों की धुरियों को ले जाने तथा (होतारम्) पदार्थों को ग्रहण करनेवाले (समिधानम्) प्रचण्ड दीप्तियुक्त (सुप्रयसम्) सुन्दर मनोहर (द्युक्षम्) प्रकाशमान (स्वर्णरम्) सुख की प्राप्ति करानेहारे (जातवेदसम्) उत्तम होता है धन जिससे उस (अग्निम्) अग्नि को (हविषा) दान से (यजध्वम्) प्राप्त होओ और उस (यज्ञेन) यज्ञ से (वर्द्धत) बढ़ो ॥१॥
Essence
जो मनुष्य शिल्प-क्रिया से बिजुली आदि के रूप को यान-विमान आदि के कार्य्य में अच्छे प्रकार युक्त करें, वे ऐश्वर्य को प्राप्त हों ॥१॥
Subject
अब द्वितीय सूक्त का आरम्भ है। उसमें फिर अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों को कहते हैं।