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Rigveda Mandal 2 / Sukta 19 / Mantra 6

43 Sukta
9 Mantra
2/19/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स र॑न्धयत्स॒दिवः॒ सार॑थये॒ शुष्ण॑म॒शुषं॒ कुय॑वं॒ कुत्सा॑य। दिवो॑दासाय नव॒तिं च॒ नवेन्द्रः॒ पुरो॒ व्यै॑र॒च्छम्ब॑रस्य॥

सः । र॒न्ध॒य॒त् । स॒ऽदिवः॑ । सार॑थये । शुष्ण॑म् । अ॒शुष॑म् । कुय॑वम् । कुत्सा॑य । दिवः॑ऽदासाय । न॒व॒तिम् । च॒ । नव॑ । इन्द्रः॑ । पुरः॑ । वि । ऐ॒र॒त् । शम्ब॑रस्य ॥

Mantra without Swara
स रन्धयत्सदिवः सारथये शुष्णमशुषं कुयवं कुत्साय। दिवोदासाय नवतिं च नवेन्द्रः पुरो व्यैरच्छम्बरस्य॥

सः। रन्धयत्। सऽदिवः। सारथये। शुष्णम्। अशुषम्। कुयवम्। कुत्साय। दिवःऽदासाय। नवतिम्। च। नव। इन्द्रः। पुरः। वि। ऐरत्। शम्बरस्य॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो मनुष्यों को (इन्द्रः) सूर्य (कुत्साय) निन्दित (सारथये) अच्छे सीखे हुए या चलानेवाले के लिये (अशुषम्) गीले (शुष्णम्) बल (कुयवम्) कुत्सित सङ्गम और (सदिवः) प्रकाश के सहित वर्त्तमान अर्थात् अन्तरिक्षस्थ पदार्थों को (रन्धयत्) अच्छे प्रकार सिद्ध करता है (दिवोदासाय) प्रकाश देनेवाले के लिये (नव,नवतिम्,च) निन्यानवें (शम्बरस्य) मेघ के (पुरः) पुरों को (व्यैरत्) प्रेरित करता है (सः) वह उपयोग में लाना योग्य है ॥६॥
Essence
जो मनुष्य दुष्ट बल को और कुशिक्षा को निवार के बल और उत्तम शिक्षाओं से कुसंस्कारों को निवार के सैकड़ों बोधों को उत्पन्न करते हैं, वे सर्वदा पूज्य होते हैं ॥६॥
Subject
अब सूर्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है।