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Rigveda Mandal 2 / Sukta 19 / Mantra 4

43 Sukta
9 Mantra
2/19/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सो अ॑प्र॒तीनि॒ मन॑वे पु॒रूणीन्द्रो॑ दाशद्दा॒शुषे॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम्। स॒द्यो यो नृभ्यो॑ अत॒साय्यो॒ भूत्प॑स्पृधा॒नेभ्यः॒ सूर्य॑स्य सा॒तौ॥

सः । अ॒प्र॒तीनि॑ । मन॑वे । पु॒रूणि॑ । इन्द्रः॑ । दा॒श॒त् । दा॒शुषे॑ । हन्ति॑ । वृ॒त्रम् । स॒द्यः । यः । नृऽभ्यः॑ । अ॒त॒साय्यः॑ । भूत् । प॒स्पृ॒धा॒नेभ्यः॑ । सूर्य॑स्य । सा॒तौ ॥

Mantra without Swara
सो अप्रतीनि मनवे पुरूणीन्द्रो दाशद्दाशुषे हन्ति वृत्रम्। सद्यो यो नृभ्यो अतसाय्यो भूत्पस्पृधानेभ्यः सूर्यस्य सातौ॥

सः। अप्रतीनि। मनवे। पुरूणि। इन्द्रः। दाशत्। दाशुषे। हन्ति। वृत्रम्। सद्यः। यः। नृऽभ्यः। अतसाय्यः। भूत्। पस्पृधानेभ्यः। सूर्यस्य। सातौ॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 23 Mantra » 4

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Meaning
(यः) जो (इन्द्रः) सूर्य के समान देनेवाला जन जैसे सूर्य (वृत्रम्) मेघको (हन्ति) हनता है वैसे शत्रुओं को मारता हुआ (दाशुषे) दूसरे देनेवाले (मनवे) विचारशील मनुष्य के लिये (अप्रतीनि) जिनकी प्रतीति नहीं है उन (पुरूणि) बहुत से धनों को (दाशत्) देवें वा (सूर्यस्य) सूर्य की (सातौ) साति में अर्थात् सूर्यमण्डलकृत विभाग में (अतसाय्यः) परोपकार में निरन्तर वर्त्तमान होता हुआ (पस्पृधानेभ्यः) स्पर्द्धा वा ईप्सा करनेवाले (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये (सद्यः) शीघ्र आनन्द देनेवाला (भूत्) होता है (सः) वह सब स्थानों से सत्कार पाता है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपरिमित धन को इकट्ठा करते और जगत् के उपकारी सुपात्रों के लिये देते हैं, वे निरन्तर ईर्ष्या वा ईप्सा करने योग्य नहीं हैं ॥४॥
Subject
अब दाता के विषय में अगले मन्त्र में कहा है।

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