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Rigveda Mandal 2 / Sukta 19 / Mantra 3

43 Sukta
9 Mantra
2/19/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स माहि॑न॒ इन्द्रो॒ अर्णो॑ अ॒पां प्रैर॑यदहि॒हाच्छा॑ समु॒द्रम्। अज॑नय॒त्सूर्यं॑ वि॒दद्गा अ॒क्तुनाह्नां॑ व॒युना॑नि साधत्॥

सः । माहि॑नः । इन्द्रः॑ । अर्णः॑ । अ॒पाम् । प्र । ऐ॒र॒य॒त् । अ॒हि॒ऽहा । अच्छ॑ । स॒मु॒द्रम् । अज॑नयत् । सूर्य॑म् । वि॒दत् । गाः । अ॒क्तुना॑ । अह्ना॑म् । व॒युना॑नि । सा॒ध॒त् ॥

Mantra without Swara
स माहिन इन्द्रो अर्णो अपां प्रैरयदहिहाच्छा समुद्रम्। अजनयत्सूर्यं विदद्गा अक्तुनाह्नां वयुनानि साधत्॥

सः। माहिनः। इन्द्रः। अर्णः। अपाम्। प्र। ऐरयत्। अहिऽहा। अच्छ। समुद्रम्। अजनयत्। सूर्यम्। विदत्। गाः। अक्तुना। अह्नाम्। वयुनानि। साधत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 23 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो जैसे (सः) वह (माहिनः) बड़ा (अहिहा) मेघ का हननेवाला (इन्द्रः) बिजली रूप अग्नि (अपाम्) अन्तरिक्ष के बीच (अर्णः) जलको (अच्छ) (प्रैरयत्) यथाक्रम से प्रेरणा देता है (समुद्रम्) समुद्र को और (सूर्यम्) सूर्यमण्डल को (अजनयत्) उत्पन्न करता है (अक्तुना) रात्रि के साथ (अह्नाम्) दिनों के सम्बन्ध करनेवाली (गाः) पृथिवियों को (विदत्) प्राप्त होता और (वयुनानि) उत्तम ज्ञानों को (साधत्) सिद्ध करता वैसे तुम लोग भी आचरण करो ॥३॥
Essence
जो मनुष्य बिजली के समान वेग और आकर्षणयुक्त शत्रुओं के हनने और विद्यादि शुभगुणों को प्रचार करनेवाले हैं, अन्याय और अन्धकार का विनाश करनेवाले संसार का सुख सिद्ध करते हैं, वे सर्वत्र पूज्य होते हैं ॥३॥
Subject
फिर सूर्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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