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Rigveda Mandal 2 / Sukta 19 / Mantra 1

43 Sukta
9 Mantra
2/19/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अपा॑य्य॒स्यान्ध॑सो॒ मदा॑य॒ मनी॑षिणः सुवा॒नस्य॒ प्रय॑सः। यस्मि॒न्निन्द्रः॑ प्र॒दिवि॑ वावृधा॒न ओको॑ द॒धे ब्र॑ह्म॒ण्यन्त॑श्च॒ नरः॑॥

अपा॑यि । अ॒स्य । अन्ध॑सः । मदा॑य । मनी॑षिणः । सु॒वा॒नस्य॑ । प्रय॑सः । यस्मि॑न् । इन्द्रः॑ । प्र॒ऽदिवि॑ । व॒वृ॒धा॒नः । ओकः॑ । द॒धे । ब्र॒ह्म॒ण्यन्तः॑ । च॒ । नरः॑ ॥

Mantra without Swara
अपाय्यस्यान्धसो मदाय मनीषिणः सुवानस्य प्रयसः। यस्मिन्निन्द्रः प्रदिवि वावृधान ओको दधे ब्रह्मण्यन्तश्च नरः॥

अपायि। अस्य। अन्धसः। मदाय। मनीषिणः। सुवानस्य। प्रयसः। यस्मिन्। इन्द्रः। प्रऽदिवि। ववृधानः। ओकः। दधे। ब्रह्मण्यन्तः। च। नरः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मनीषिणः) मनीषी मन जीते हुए (ब्रह्मण्यतः) बहुत धनकी कामना करनेवाले (नरः च) और नायक अग्रगन्ता मनुष्यो ! (यस्मिन्) जिस (प्रदिवि) प्रकृष्ट प्रकाश में (वावृधानः) बढ़ा हुआ (इन्द्रः) सूर्य (ओकः) स्थान को (दधे) धारण करता है उसमें (सुवानस्य) उत्पद्यमान (प्रयसः) मनोहर (अस्य) इस (अन्धसः) अन्न को (मदाय) आनन्द के लिये तुम लोगों ने (अपायि) पान किया उस सबको हम लोग भी ग्रहण करें ॥१॥
Essence
विद्वान् जन जिसमें बढ़े हुए विद्या को धारण करते हैं, उसमें हम लोग भी बैठें, इस विज्ञान को स्वीकार करें ॥१॥
Subject
अब नव चावाले उन्नीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के विषय का वर्णन करते हैं।