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Rigveda Mandal 2 / Sukta 18 / Mantra 7

43 Sukta
9 Mantra
2/18/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मम॒ ब्रह्मे॑न्द्र या॒ह्यच्छा॒ विश्वा॒ हरी॑ धु॒रि धि॑ष्वा॒ रथ॑स्य। पु॒रु॒त्रा हि वि॒हव्यो॑ ब॒भूथा॒स्मिञ्छू॑र॒ सव॑ने मादयस्व॥

मम॑ । ब्रह्म॑ । इ॒न्द्र॒ । या॒हि॒ । अच्छ॑ । विश्वा॑ । हरी॒ इति॑ । धु॒रि । धि॒ष्व॒ । रथ॑स्य । पु॒रु॒ऽत्रा । हि । वि॒ऽहव्यः॑ । ब॒भूथ॑ । अ॒स्मिन् । शू॒र॒ । सव॑ने । मा॒द॒य॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
मम ब्रह्मेन्द्र याह्यच्छा विश्वा हरी धुरि धिष्वा रथस्य। पुरुत्रा हि विहव्यो बभूथास्मिञ्छूर सवने मादयस्व॥

मम। ब्रह्म। इन्द्र। याहि। अच्छ। विश्वा। हरी इति। धुरि। धिष्व। रथस्य। पुरुऽत्रा। हि। विऽहव्यः। बभूथ। अस्मिन्। शूर। सवने। मादयस्व॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 22 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) धन की इच्छा करनेवाले आप (मम) मेरे (ब्रह्म) धनको (याहि) प्राप्त होओ जो (रथस्य) यानसमूह के (धुरि) धारण करनेवाले अङ्ग में अर्थात् धुरी में (हरी) धारण और आकर्षण खींचने का गुण जिनमें है उन दोनों से यान रथादि को (धिष्व) धारण करो उससे (पुरुत्रा) बहुत (विश्वा) समस्त धनों को (अच्छ, याहि) उत्तम गति से आओ, प्राप्त होओ हे (शूर) निर्भय (अस्मिन्) इस (सवने) ऐश्वर्य के निमित्त (विहव्यः) विविध प्रकार ग्रहण करने योग्य आप (बभूथ) होओ और हम लोगों को (हि) ही (मादयस्व) आनन्दित कीजिये ॥७॥
Essence
सब सज्जनों को सबके प्रति ऐसा कहना चाहिये कि जो हमारे पदार्थ हैं, वे आपके सुख के लिये हों, जैसे तुम लोग हम लोगों को आनन्दित करो, वैसे हम लोग तुमको आनन्दित करें ॥७॥
Subject
अब पदार्थों के विषय में अगले मन्त्र में कहा है।

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