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Rigveda Mandal 2 / Sukta 18 / Mantra 6

43 Sukta
9 Mantra
2/18/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आशी॒त्या न॑व॒त्या या॑ह्य॒र्वाङा श॒तेन॒ हरि॑भिरु॒ह्यमा॑नः। अ॒यं हि ते॑ शु॒नहो॑त्रेषु॒ सोम॒ इन्द्र॑ त्वा॒या परि॑षिक्तो॒ मदा॑य॥

आ । अ॒शी॒त्या । न॒व॒त्या । या॒हि॒ । अ॒र्वाङ् । आ । श॒तेन॑ । हरि॑ऽभिः । उ॒ह्यमा॑नः । अ॒यम् । हि । ते॒ । शु॒नऽहो॑त्रेषु । सोमः॑ । इन्द्र॑ । त्वा॒ऽया । परि॑ऽसिक्तः । मदा॑य ॥

Mantra without Swara
आशीत्या नवत्या याह्यर्वाङा शतेन हरिभिरुह्यमानः। अयं हि ते शुनहोत्रेषु सोम इन्द्र त्वाया परिषिक्तो मदाय॥

आ। अशीत्या। नवत्या। याहि। अर्वाङ्। आ। शतेन। हरिऽभिः। उह्यमानः। अयम्। हि। ते। शुनऽहोत्रेषु। सोमः। इन्द्र। त्वाऽया। परिऽसिक्तः। मदाय॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 22 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) दुःख विदीर्ण करनेवाले (ते) आपके (त्वाया) आपकी कामना से जो (अयम्) यह (शुनहोत्रेषु) सुख देनेवाले कलाघरों में (परिषिक्तः) सब ओर से उत्तम पदार्थों से सींचा हुआ है (हि) उसीको आप (अर्वाङ्) नीचे जाते हुए (अशीत्या) अस्सी (नवत्या) नब्बे (हरिभिः) हरणशील पदार्थों से युक्त यानसे (उह्यमानः) चलाये जाते हुए (आ) आओ (शतेन) सौ पदार्थों से युक्त रथसे (मदाय) आनन्द के लिये (आ,याहि) आओ ॥६॥
Essence
जो ओषधियों के सेवन और सुन्दर पथ्य से नीरोगता से आनन्दित होते हुए सौ प्रकार के यानों और यन्त्रों को बनाते हैं, वे नीचे-ऊपर जा सकते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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