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Rigveda Mandal 2 / Sukta 18 / Mantra 4

43 Sukta
9 Mantra
2/18/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ द्वाभ्यां॒ हरि॑भ्यामिन्द्र या॒ह्या च॒तुर्भि॒रा ष॒ड्भिर्हू॒यमा॑नः। आष्टा॒भिर्द॒शभिः॑ सोम॒पेय॑म॒यं सु॒तः सु॑मख॒ मा मृध॑स्कः॥

आ । द्वाभ्या॑म् । हरि॑ऽभ्याम् । इ॒न्द्र॒ । या॒हि॒ । आ । च॒तुःऽभिः॑ । आ । ष॒ट्ऽभिः । हू॒यमा॑नः । आ । अ॒ष्टा॒भिः । द॒शऽभिः॑ । सो॒म॒ऽपेय॑म् । अ॒यम् । सु॒तः । सु॒ऽम॒ख॒ । मा । मृधः॑ । क॒रिति॑ कः ॥

Mantra without Swara
आ द्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र याह्या चतुर्भिरा षड्भिर्हूयमानः। आष्टाभिर्दशभिः सोमपेयमयं सुतः सुमख मा मृधस्कः॥

आ। द्वाभ्याम्। हरिऽभ्याम्। इन्द्र। याहि। आ। चतुःऽभिः। आ। षट्ऽभिः। हूयमानः। आ। अष्टाभिः। दशऽभिः। सोमऽपेयम्। अयम्। सुतः। सुऽमख। मा। मृधः। करिति कः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त (हूयमानः) बुलाये हुए आप (द्वाभ्याम्) दो (हरिभ्याम्) हरणशील पदार्थों से युक्त यानसे आओ, छः पदार्थों से युक्त यानसे आओ (अष्टाभिः) आठ वा (दशभिः) दश पदार्थों से युक्त यान से आओ, जो (अयम्) यह (सुतः) उत्पन्न किया हुआ पदार्थों का पीने योग्य रस है उस (सोमपेयम्) पदार्थों के रस के पीने के लिये आओ, हे (सुमख) सुन्दर यज्ञोंवाले आप सज्जनों के साथ (मृधः) अभीष्ट संग्रामों को (मा,कः) मत करो ॥४॥
Essence
जो अनेक अग्नि आदि पदार्थों से उत्पन्न किये हुए यन्त्रों से चलाये हुए यानों में स्थित होकर जाते आते हैं, वे स्तुति के साथ प्रकट होते हैं। जो धार्मिकों के साथ विरोध नहीं करते, वे विजयी होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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