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Rigveda Mandal 2 / Sukta 18 / Mantra 3

43 Sukta
9 Mantra
2/18/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हरी॒ नु कं॒ रथ॒ इन्द्र॑स्य योजमा॒यै सू॒क्तेन॒ वच॑सा॒ नवे॑न। मो षु त्वामत्र॑ ब॒हवो॒ हि विप्रा॒ नि री॑रम॒न्यज॑मानासो अ॒न्ये॥

हरी॒ इति॑ । नु । क॒म् । रथे॑ । इन्द्र॑स्य । यो॒ज॒म् । आ॒ऽयै । सू॒क्तेन॑ । वच॑सा । नवे॑न । मो इति॑ । सु । त्वाम् । अत्र॑ । ब॒हवः॑ । हि । विप्राः॑ । नि । री॒र॒म॒न् । यज॑मानासः । अ॒न्ये ॥

Mantra without Swara
हरी नु कं रथ इन्द्रस्य योजमायै सूक्तेन वचसा नवेन। मो षु त्वामत्र बहवो हि विप्रा नि रीरमन्यजमानासो अन्ये॥

हरी इति। नु। कम्। रथे। इन्द्रस्य। योजम्। आऽयै। सूक्तेन। वचसा। नवेन। मो इति। सु। त्वाम्। अत्र। बहवः। हि। विप्राः। नि। रीरमन्। यजमानासः। अन्ये॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वान् ! जो (इन्द्रस्य) बिजली रूप अग्नि सम्बन्धी (रथे) यान में (हरी) धारण आकर्षण और वेग आदि गुणों वाले वायु और अग्नि (नु) शीघ्र (कम्) सुख को सिद्ध करते हैं वा जिन को मैं (अत्र) इसमें (सूक्तेन) सुन्दर प्रतिपादन किये (वचसा) भाषण से (नवेन) नवीन प्रबन्ध से (आयै) गमन करने को (योजम्) युक्त करता हूँ इस रथ में (बहवः) बहुत (विप्राः) मेधावी जन (त्वाम्) आपको (हि) ही (सु,नि,रीरमन्) अच्छे प्रकार रमा रहे हैं (अन्ये) और (यजमानासः) सम्यग् ज्ञाता भी अर्थात् उन मेधावियों से दूसरे विज्ञानवान् जन भी इस उक्त रथ में विपरीत हैं, वे (मो) नहीं रमाते हैं ॥३॥
Essence
जो बिजली रथ को नहीं सिद्ध करते हैं, वे सर्वत्र आप न रम सकते हैं और न दूसरों को रमा सकते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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