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Rigveda Mandal 2 / Sukta 18 / Mantra 2

43 Sukta
9 Mantra
2/18/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सास्मा॒ अरं॑ प्रथ॒मं स द्वि॒तीय॑मु॒तो तृ॒तीयं॒ मनु॑षः॒ स होता॑। अ॒न्यस्या॒ गर्भ॑म॒न्य ऊं॑ जनन्त॒ सो अ॒न्येभिः॑ सचते॒ जेन्यो॒ वृषा॑॥

सः । अ॒स्मै॒ । अर॑म् । प्र॒थ॒मम् । सः । द्वि॒तीय॑म् । उ॒तो इति॑ । तृ॒तीय॑म् । मनु॑षः । सः । होता॑ । अ॒न्यस्याः॑ । गर्भ॑म् । अ॒न्ये । ऊँ॒ इति॑ । ज॒न॒न्त॒ । सः । अ॒न्येभिः॑ । स॒च॒ते॒ । जेन्यः॑ । वृषा॑ ॥

Mantra without Swara
सास्मा अरं प्रथमं स द्वितीयमुतो तृतीयं मनुषः स होता। अन्यस्या गर्भमन्य ऊं जनन्त सो अन्येभिः सचते जेन्यो वृषा॥

सः। अस्मै। अरम्। प्रथमम्। सः। द्वितीयम्। उतो इति। तृतीयम्। मनुषः। सः। होता। अन्यस्याः। गर्भम्। अन्ये। ऊँ इति। जनन्त। सः। अन्येभिः। सचते। जेन्यः। वृषा॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्य ! (सः) वह रथयान गमन साधन (अस्मै) इस स्वामी के लिये कि जो बनानेवाला है (प्रथमम्) पहिले अर्थात् पृथिवी में गमन (सः) वह (द्वितीयम्) दूसरे जल में गमन (उतो) और (तृतीयम्) तीसरे अन्तरिक्ष में गमन को सम्बद्ध करता मिलाता है तथा (सः) वह (मनुषः) मनुष्यों से उत्पन्न हुए सर्व पदार्थ का (होता) सुख देनेवाला (सः) वह (जेन्यः) विजय करानेवाला और (वृषा) अत्यन्त बलयुक्त होता हुआ (अन्यस्याः) दूसरी गति का (गर्भम्) ग्रहण (अरम्) पूर्ण (सचते) सम्बद्ध करता है (ऊँ) उसी को (अन्येभिः) और विद्वानों के साथ (अन्ये) और विद्वान् (जनन्त) उत्पन्न करें ॥२॥
Essence
विद्वान् जन यदि बिजली रूप अग्नि को रथों में अच्छे प्रकार युक्त करें, तो यह समस्त यानों को सब गतियों से चलाता और विजय का हेतु होता है ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है

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