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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 9

43 Sukta
9 Mantra
2/17/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

नू॒नम् । सा । ते॒ । प्रति॑ । वर॑म् । जरि॒त्रे । दु॒ही॒यत् । इ॒न्द्र॒ । दक्षि॑णा । म॒घोनी॑ । शिक्ष॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । मा । अति॑ । ध॒क् । भगः॑ । नः॒ । बृ॒हत् । व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥

Mantra without Swara
नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी। शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥

नूनम्। सा। ते। प्रति। वरम्। जरित्रे। दुहीयत्। इन्द्र। दक्षिणा। मघोनी। शिक्ष। स्तोतृऽभ्यः। मा। अति। धक्। भगः। नः। बृहत्। वदेम। विदथे। सुऽवीराः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) देनेवाले राजन् ! (ते) आपके राज्य में जो (दक्षिणा) प्राण देनेवाली (मघोनी) बहुत धन से युक्त विदुषी (जरित्रे) स्तुति करनेवाले के लिए (प्रतिवरम्) श्रेष्ठ काम को (दुहीयत्) पूर्ण करे (सा) वह (नूनम्) निश्चय से कल्याण करनेवाली हो, हे विदुषी ! तू कन्याओं को (शिक्ष) शिक्षा दे (नः) हम लोगों के लिये (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवाले विद्वानों से (मा, अति, धक्) मत किसी काम का विनाश कर जिससे (सुवीराः) सुन्दर विद्या में व्याप्त होनेवाले वीरों से युक्त हम लोग (विदथे) विद्यादानरूपी यज्ञमें (बृहत्) बहुत (भगः) ऐश्वर्य को (वदेम) कहें ॥९॥
Essence
हे विद्वानो ! जो धर्मात्मा विदुषी वा पण्डितानी स्त्रियाँ हों, उनसे सब कन्याओं को सुन्दर शिक्षा दिलाओ जिससे कार्य विनाश न हो ॥९॥ इस सूक्त में विद्वान्, ईश्वर, और विदुषियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥ यह सत्रहवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विदुषी के गुणों को कहते हैं।