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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 8

43 Sukta
9 Mantra
2/17/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
भो॒जं त्वामि॑न्द्र व॒यं हु॑वेम द॒दिष्ट्वमि॒न्द्रापां॑सि॒ वाजा॑न्। अ॒वि॒ड्ढी॑न्द्र चि॒त्रया॑ न ऊ॒ती कृ॒धि वृ॑षन्निन्द्र॒ वस्य॑सो नः॥

भो॒जम् । त्वाम् । इ॒न्द्र॒ । व॒यम् । हु॒वे॒म॒ । द॒दिः । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । अपां॑सि । वाजा॑न् । अ॒वि॒ड्ढि । इ॒न्द्र॒ । चि॒त्रया॑ । नः॒ । ऊ॒ती । कृ॒धि । वृ॒ष॒न् । इ॒न्द्र॒ । वस्य॑सः । नः॒ ॥

Mantra without Swara
भोजं त्वामिन्द्र वयं हुवेम ददिष्ट्वमिन्द्रापांसि वाजान्। अविड्ढीन्द्र चित्रया न ऊती कृधि वृषन्निन्द्र वस्यसो नः॥

भोजम्। त्वाम्। इन्द्र। वयम्। हुवेम। ददिः। त्वम्। इन्द्र। अपांसि। वाजान्। अविड्ढि। इन्द्र। चित्रया। नः। ऊती। कृधि। वृषन्। इन्द्र। वस्यसः। नः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वान् जिन (भोजम्) भोगनेवाले (त्वाम्) आपको (वयम्) हम लोग (हुवेम) स्वीकार करें सो आप हम लोगों को स्वीकार कीजिये, हे (इन्द्र) दुःख विदीर्ण करनेवाले विद्वान्! (ददिः) दानशील (त्वम्) आप (अपांसि) कर्मों को (वाजान्) बोधों को (अविड्ढि) सुरक्षित करो, हे (इन्द्र) शत्रु विनाशनेवाले विद्वान् आप (चित्रया) चित्र-विचित्र अनेकविध (ऊती) रक्षा से युक्त (नः) हम लोगों को (कृधि) करो, हे (वृषन्) सींचनेवाले (इन्द्र) सुख देनेवाले विद्वान् आप (नः) हम लोगों को (वस्यसः) अत्यन्त धनवान् करो ॥८॥
Essence
जैसे मित्र मित्रों की स्तुति करते हैं, वैसे पढ़नेवाले पढनेवालों की प्रशंसा करें, ऐसे एक-दूसरे की रक्षा से ऐश्वर्य की उन्नति करें ॥८॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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