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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 7

43 Sukta
9 Mantra
2/17/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒मा॒जूरि॑व पि॒त्रोः सचा॑ स॒ती स॑मा॒नादा सद॑स॒स्त्वामि॑ये॒ भग॑म्। कृ॒धि प्र॑के॒तमुप॑ मा॒स्या भ॑र द॒द्धि भा॒गं त॒न्वो॒३॒॑ येन॑ मा॒महः॑॥

अ॒मा॒जूःऽइ॑व । पि॒त्रोः । सचा॑ । स॒ती । स॒मा॒नात् । आ । सद॑सः । त्वाम् । इ॒ये॒ । भग॑म् । कृ॒धि । प्र॒ऽके॒तम् । उप॑ । मा॒सि॒ । आ । भ॒र॒ । द॒द्धि । भा॒गम् । त॒न्वः॑ । येन॑ । म॒महः॑ ॥

Mantra without Swara
अमाजूरिव पित्रोः सचा सती समानादा सदसस्त्वामिये भगम्। कृधि प्रकेतमुप मास्या भर दद्धि भागं तन्वो३ येन मामहः॥

अमाजूःऽइव। पित्रोः। सचा। सती। समानात्। आ। सदसः। त्वाम्। इये। भगम्। कृधि। प्रऽकेतम्। उप। मासि। आ। भर। दद्धि। भागम्। तन्वः। येन। ममहः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे कन्ये (सती) वर्त्तमान तू (सचा) सम्बन्ध से (अमाजूरिव) जो घर में बुड्ढा होता उसके समान (पित्रोः) माता पिता के (समानात्) समान भाव से (सदसः) जिसमें पहुँचते हैं उस स्थान से जिस (त्वा) तुझे मैं (इये) प्राप्त होऊँ वह तू (प्रकेतम्) उत्कर्ष विज्ञान को और (भागम्) ऐश्वर्य को (कृधि) सिद्ध कर तथा (मासि) प्रति महीने में (उपाभर) उत्तम प्राप्त हुए आभूषणों को पहिनकर (भागम्) सेवन करने योग्य पदार्थ (दद्धि) माँगो (येन) जिससे (मामहः) सत्कार करने योग्य पुत्रादिकों को वा प्रशंसा करने योग्य पदार्थों को प्राप्त हो उस व्यवहार से (तन्वः) शरीर के भाग को माँगो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो कन्या विद्या को पढ़कर गृहाश्रम को प्राप्त हों, वे सत्कार करने योग्यों का सत्कार कर और तिरस्कार करने योग्यों का तिरस्कार कर पुरुषार्थ से ऐश्वर्य को बढ़ावें ॥७॥
Subject
अब विदुषी के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।