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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 6

43 Sukta
9 Mantra
2/17/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सास्मा॒ अरं॑ बा॒हुभ्यां॒ यं पि॒ताकृ॑णो॒द्विश्व॑स्मा॒दा ज॒नुषो॒ वेद॑स॒स्परि॑। येना॑ पृथि॒व्यां नि क्रिविं॑ श॒यध्यै॒ वज्रे॑ण ह॒त्व्यवृ॑णक्तुवि॒ष्वणिः॑॥

सः । अ॒स्मै॒ । अर॑म् । बा॒हुऽभ्या॑म् । यम् । पि॒ता । अकृ॑णोत् । विश्व॑स्मात् । आ । ज॒नुषः॑ । वेद॑सः । परि॑ । येन॑ । पृ॒थि॒व्याम् । नि । क्रिवि॑म् । श॒यध्यै॑ । वज्रे॑ण । ह॒त्वी । अवृ॑णक् । तु॒वि॒ऽस्वनिः॑ ॥

Mantra without Swara
सास्मा अरं बाहुभ्यां यं पिताकृणोद्विश्वस्मादा जनुषो वेदसस्परि। येना पृथिव्यां नि क्रिविं शयध्यै वज्रेण हत्व्यवृणक्तुविष्वणिः॥

सः। अस्मै। अरम्। बाहुऽभ्याम्। यम्। पिता। अकृणोत्। विश्वस्मात्। आ। जनुषः। वेदसः। परि। येन। पृथिव्याम्। नि। क्रिविम्। शयध्यै। वज्रेण। हत्वी। अवृणक्। तुविऽस्वनिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! (पिता) सबकी पालना करनेवाला ईश्वर (विश्वस्मात्) सब (जनुषः) प्रसिद्ध (वेदसः) धन वा विज्ञान वा (बाहुभ्याम्) भुजाओं से (यम्) जिसको (अरम्) पूर्ण (अकृणोत्) करता है (सः) वह तू जैसे (तुविष्वणिः) बहुत परमाणुओं का जो कि इकट्ठे होकर एक पदार्थ हो रहे हैं उनका अच्छे प्रकार विभाग करनेवाला सूर्य (येन) जिस (वज्रेण) वज्रसे (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (शयध्यै) सोने के लिये अर्थात् गिरने के लिये (क्रिविम्) कूप के समान (हत्वी) छिन्न-भिन्न कर अर्थात् खोदके कूप जलको जैसे निकालें वैसे मेघको (पर्य्यवृणक्) सब ओरसे छिन्न-भिन्न करता और संसार की पालना करता है वैसे (अस्मै) इस बालक आदि के लिये सुख (आ) अच्छे प्रकार सिद्ध करो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल को उत्पन्न कर सबका सुख सिद्ध करता है, वैसे अध्यापक वा पिता समस्त सुन्दर शिक्षाओं से सन्तानों को सुभूषित कर निरन्तर सुखी करे ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।