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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 4

43 Sukta
9 Mantra
2/17/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अधा॒ यो विश्वा॒ भुव॑ना॒भि म॒ज्मने॑शान॒कृत्प्रव॑या अ॒भ्यव॑र्धत। आद्रोद॑सी॒ ज्योति॑षा॒ वह्नि॒रात॑नो॒त्सीव्य॒न्तमां॑सि॒ दुधि॑ता॒ सम॑व्ययत्॥

अध॑ । यः । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । म॒ज्मना॑ । ई॒शा॒न॒ऽकृत् । प्रऽव॑याः । अ॒भि । अव॑र्धत । आत् । रोद॑सी॒ इति॑ । ज्योति॑षा । वह्निः॑ । आ । अ॒त॒नो॒त् । सीव्य॑न् । तमां॑सि । दुधि॑ता । सम् । अ॒व्य॒य॒त् ॥

Mantra without Swara
अधा यो विश्वा भुवनाभि मज्मनेशानकृत्प्रवया अभ्यवर्धत। आद्रोदसी ज्योतिषा वह्निरातनोत्सीव्यन्तमांसि दुधिता समव्ययत्॥

अध। यः। विश्वा। भुवना। अभि। मज्मना। ईशानऽकृत्। प्रऽवयाः। अभि। अवर्धत। आत्। रोदसी इति। ज्योतिषा। वह्निः। आ। अतनोत्। सीव्यन्। तमांसि। दुधिता। सम्। अव्ययत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो (यः) जो (ईशानकृत्) ईश्वरता का शील रखनेवाले पुरुषों को करता वा (प्रवयाः) उत्कर्षता से व्याप्त होता और (मज्मना) बलसे (विश्वा) समस्त (भुवना) लोकों के (अभि,अवर्द्धत्) अभिमुख वृद्धि को प्राप्त होता और जैसे (वह्निः) सबको एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचानेवाला अग्नि (ज्योतिषा) अपनी लपट से (तमांसि) रात्रिरूपी अन्धकारों को निवृत्त करता वैसे (रोदसी) आकाश और पृथिवियों को (आतनोत्) विस्तार तथा (अभिसीव्यन्) सब ओर से उन लोकों को रचता हुआ (दुधिता) जो पदार्थ दूसरे देश में होते वा सुख करनेवाले होते हैं उनको (अव्ययत्) सब ओर से आच्छादित करता है (सः) वह (अध) उक्त विषयों के अनन्तर सबको पूजनीय है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस जगदीश्वर ने प्रकाश के लिये सूर्य, भोजनों के लिये औषधि, पीने के लिये जल रसों को, निवास के लिये भूमि और कर्म करने के लिये शरीर आदि बनाये हैं, वह पिता के तुल्य सबको सत्कार करने योग्य है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।