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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 3

43 Sukta
9 Mantra
2/17/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॑कृणोः प्रथ॒मं वी॒र्यं॑ म॒हद्यद॒स्याग्रे॒ ब्रह्म॑णा॒ शुष्म॒मैर॑यः। र॒थे॒ष्ठेन॒ हर्य॑श्वेन॒ विच्यु॑ताः॒ प्र जी॒रयः॑ सिस्रते स॒ध्र्य१॒॑क् पृथ॑क्॥

अध॑ । अ॒कृ॒णोः॒ । प्र॒थ॒मम् । वी॒र्य॑म् । म॒हत् । यत् । अ॒स्य॒ । अग्रे॑ । ब्रह्म॑णा । शुष्म॑म् । ऐर॑यः । र॒थे॒ऽस्थेन॑ । हरि॑ऽअश्वेन । विऽच्यु॑ताः । प्र । जी॒रयः॑ । सि॒स्र॒ते॒ । स॒ध्र्य॑क् । पृथ॑क् ॥

Mantra without Swara
अधाकृणोः प्रथमं वीर्यं महद्यदस्याग्रे ब्रह्मणा शुष्ममैरयः। रथेष्ठेन हर्यश्वेन विच्युताः प्र जीरयः सिस्रते सध्र्य१क् पृथक्॥

अध। अकृणोः। प्रथमम्। वीर्यम्। महत्। यत्। अस्य। अग्रे। ब्रह्मणा। शुष्मम्। ऐरयः। रथेऽस्थेन। हरिऽअश्वेन। विऽच्युताः। प्र। जीरयः। सिस्रते। सध्र्यक्। पृथक्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् यदि आप (अस्य) इस जगत् के (अग्रे) प्रथम में (महत्) बहुत (वीर्यम्) पराक्रम (अकृणोः) करो कि (यत्) जिससे (ब्रह्मणा) अन्न के योग से (शुष्मम्) बल को (ऐरयः) प्रेरित करो यदि विद्वान् जन (हर्यश्वेन) हर्यश्वरथ अर्थात् हरणशील शीघ्रगामी अश्व जिसमें उस (रथेष्ठेन) रथ में स्थित जन के साथ (विच्युताः) विशेषता से चलायमान (प्रजीरयः) उत्तमता से अवस्था के हरण करनेवाले होते हुए और (सध्र्यक्) जो समान स्थान को प्राप्त होता वह मनुष्य (पृथक्) अलग-अलग (सिस्रते) प्राप्त होते हैं (अध) इसके अनन्तर वह या वे पूर्वोक्त जन शत्रुओं से पराजय को नहीं प्राप्त होते ॥३॥
Essence
जो इस संसार में सबके बल पराक्रम को बढ़ानेवाले साधनोपसाधनयुक्त अलग-अलग वा मिलकर प्रयत्न करते हैं, वे अन्नादि ऐश्वर्ययुक्त होते हैं ॥३॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।