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Rigveda Mandal 2 / Sukta 17 / Mantra 1

43 Sukta
9 Mantra
2/17/1
Devata- इन्द्र: 1 Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती 1 Swara- निषादः
Mantra with Swara
तद॑स्मै॒ नव्य॑मङ्गिर॒स्वद॑र्चत॒ शुष्मा॒ यद॑स्य प्र॒त्नथो॒दीर॑ते। विश्वा॒ यद्गो॒त्रा सह॑सा॒ परी॑वृता॒ मदे॒ सोम॑स्य दृंहि॒तान्यैर॑यत्॥ 1

तत् । अ॒स्मै॒ । नव्य॑म् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् । अ॒र्च॒त॒ । शुष्माः॑ । यत् । अ॒स्य॒ । प्र॒त्नऽथा॑ । उ॒त्ऽईर॑ते । विश्वा॑ । यत् । गो॒त्रा । सह॑सा । परि॑ऽवृता । मदे॑ । सोम॑स्य । दृं॒हि॒तानि॑ । ऐर॑यत् ॥

Mantra without Swara
तदस्मै नव्यमङ्गिरस्वदर्चत शुष्मा यदस्य प्रत्नथोदीरते। विश्वा यद्गोत्रा सहसा परीवृता मदे सोमस्य दृंहितान्यैरयत्॥

तत्। अस्मै। नव्यम्। अङ्गिरस्वत्। अर्चत। शुष्माः। यत्। अस्य। प्रत्नऽथा। उत्ऽईरते। विश्वा। यत्। गोत्रा। सहसा। परिऽवृता। मदे। सोमस्य। दृंहितानि। ऐरयत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो (अस्य) इस सूर्यमण्डल सम्बन्धी (सोमस्य) ओषधि गण के (यत्) जो (प्रत्नथा) पुरातन पदार्थ के समान (शुष्मा) दूसरों को शुष्क करनेवाले (विश्वा) और समस्त (गोत्रा) गोत्र जो कि (परीवृता) सब ओर से वर्त्तमान वे (महता) बल के साथ (दृंहितानि) धारण किये वा बढ़े हुए (उदीरते) उत्कर्षता से दूसरे पदार्थों को कम्पन दिलाते हैं (तत्) वह (नव्यम्) नवीन कर्म (अस्मै) इसके लिये (अङ्गिरस्वत्) प्राण के तुल्य तुम लोग (अर्चत) सत्कृत करो (यत्) जो (मदे) आनन्द के लिये उत्तमता से होता है उसको जो (ऐरयत्) कम्पाता कार्य में लाता है, उसको तुम स्वरूप से जानो ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने समस्त भूगोलों के धारण करने को सूर्यमण्डल बनाया है, उसका सदा ध्यान किया करो ॥१॥
Subject
अब नव चावाले सत्रहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में सूर्य के गुणों का उपदेश करते हैं।